एशिया का सुकरात जिसके विचार तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज है, 94 वर्ष के तीन ट्रेंड सेंटर नेताओं की कहानी
इवी रामास्वामी पेरियार 94 वर्ष के ट्रेंड सेंटर द्रविड़ नेता
अन्नादुरई, करूणानिधि, एमजी रामचंद्रन और पेरियार
पेरियार यह नाम दक्षिण की राजनीति में एक ट्रेंड सेंटर के रूप में लिया जाता है, यह भी 94 साल की उम्र में दफनाएं गए थे, वह अपनी जिंदगी में द्रविड़ अस्मिता का विचार छोड़ गए, जिसे लोगों ने द्रविड़ राष्ट्रवाद करार दिया, पर रावण को अपना नायक मानने वाले यह नेता ब्राह्मण आडंबर रीति रिवाज और अंधविश्वास के घोर विरोधी थे, युनेस्को ने उन्हे 'नए युग का पैगम्बर' और दक्षिण पूर्व एशिया का सुकरात करार दिया था, पेरियार वह व्यक्ति थे, जो कुंडी अरासू पत्रिका में 1933 में गांधी की आलोचना इसीलिए करते है कि क्योंकि उनको उनके प्रशंसक पैगम्बर या विष्णु का अवतार की तरह बताते है, वह गांधी के लिए लिखते है कि " उनकी धार्मिक वेशभूषा और ईश्वर से जुड़ी सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, मन की स्वच्छता, आत्मा की शक्ति, त्याग और तपस्या की लगातार बाते करना एक ओर था, दूसरी ओर था उनके अनुयायियों और अन्यों द्वारा उन्हें ऋषि, ईसा मसीह, पैगम्बर, महात्मा और विष्णु का अवतार बताना इसके साथ ही गांधी के नाम का इस्तेमाल अवसरवादी धनी और शिक्षित वर्ग अपने हितों को साधने के लिए कर रहा है, इन सबके चलते गांधी एक राजनीतिक तानाशाह बन गए हैं|" यह उनका लेखन उन्हे व्यक्ति पूजा का विरोधी और उनकी कांग्रेस यात्रा का समापन क्यों हुआ, उसका उनके शब्दों में अवसरवादी तबके के हाथ में राजनीति का जाना साफ झलकता है, यही वह कारण है, कि राजनीतिक आंदोलन के प्रणेता होने के बावजूद वह राजनीति से दूर थे उनका मानना था, कि राजनीति में सक्रियता इंसान को भ्रष्ट बना देती है|उन्होने धार्मिक आडंबरों की जगह नास्तिकता पर क्यों जोर दिया, तिलक लगाना, पिण्ड दान करना, मंगलसूत्र पहनना क्यों उनके समर्थकों ने बंद कर दिया, इसका जवाब जातिवाद की जड़ में है साथ की भारत की वर्ण व्यवस्था से वह बहुत चिढ़ते थे, वह इसका जिम्मेदार ब्राह्मणवाद को मानते थे, यही कारण है कि उन्होंने गैर ब्राह्मण जो द्रविड़ थे, जो आर्यों से पृथक थे उनको एकजुट करने का काम किया , उन्होने 1944 में आत्मसम्मान आंदोलन प्रारंभ किया, जिसका उद्देश्य गैर ब्राह्मण जो कि महात्मा गांधी के हरिजन थे और सवर्ण जातियों की कुप्रथा के शिकार थे उनके मध्य आंदोलन छेड़ा, जिसे द्रविड़ आंदोलन कहा गया, अन्नादुरई और करुणानिधि उसी आंदोलन से उभरे नेता थे, जो तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज रहे|
पेरियार एक सभा में बोलते हुये
संत गुरुनानक ने जातिवाद को मिटाने के लिए लंगर शुरु किया, जिसमें सभी जाति के लोग आज भी एक साथ अन्न चखते हैं, कबीर ने पण्डितों और मौलानाओं के धार्मिक अंधता को तोड़ने के लिए अपनी वाणी को हथियार बनाया, वही इवी रामास्वामी नायर ने सड़क पर संघर्ष कर अपनी लेखनी के सहायता से एक जनांदोलन खड़ा किया| उन्होने तर्क और नास्तिकता को अपने जीवन में उतारा था, जिस प्रकार आर्यसमाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने शिवरात्रि पर शिवलिंग के ऊपर चूहे को चढ़ते देख सोचा था,कि जो मूर्ति खुद की रक्षा नहीं कर सकती उसमें भगवान कैसे हो सकता है, और वह मूर्तिपूजा के विरोधी हो गए उसी प्रकार 1904 में पेरियार काशी गए थे, जब वह वहां भोजन करने के लिए गैर-ब्राह्मण होने के कारण झुठन खाने को विवश हुए तो वह ब्राह्मणवाद के विरोधी और गैर आस्थावान हो गए|
बीआर अंबेडकर और पेरियार
जब उन्होंने जन जाग्रति की शुरुआत की तो सी राजागोपालचारी ने उन्हें कांग्रेस से जोड़ा, सी राजागोपालचारी वह पहले 94 वर्ष तक जीए ट्रेंड सेंटर नेता थे, जिन्होने तमिलनाडु सहित पूरे देश पर असर ड़ाला था, खेर उस समय तमिलनाडु मद्रास हुआ करता था और वह कांग्रेस मद्रास प्रेसीडेंसी यूनिट के अध्यक्ष तक बने, वह 1919 में गांधीजी से प्रभावित होकर कांग्रेस में जुड़े थे पर उनके निर्देशों की अवहेलना करते हुए वह वायकोम सत्याग्रह में कूद पड़े यह 1924 की बात है आज के केरल तब का त्रावणकोर के राजा जिस रास्ते से मंदिर जाते थे, वहां दलितों के जाने की मनाही थी, राजा पेरियार के मित्र थे, पर वह उस ब्राह्मणवादी आडंबर से ग्रसित थे, जिसके पेरियार विरोधी थे, इस आंदोलन में उतरने के लिए उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी वह कांग्रेस में रहते हुए जातीय आरक्षण का प्रस्ताव लाना चाहते थे पर वह पटल पर आया नहीं, वह पुख्ता कारण जिसके लिए वह कांग्रेस से दूर हुए वह बना चेरनमादेवी का स्कूल जो कांग्रेस के अनुदान पर चलता था पर ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच खाना परोसते हुए वहां भेदभाव होता था, जब इस प्रकरण में कांग्रेस पार्टी उन्हे संलिप्त दिखी तो उन्होंने पार्टी और गांधी से किनारा कर लिया|
एमजी रामचंद्रन और पेरियार
तब उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलन चलाया जो स्वाभिमान जगाने के लिए गैर-ब्राह्मणों का आंदोलन था, जिन्हे वह द्रविड़ कहते थे, 1916 में बनी जस्टिस पार्टी (दक्षिण भारतीय लिबरल फ़ेडरेशन) को उन्होने 1944 में द्रविड़ कजगम पार्टी में मिला लिया, वह कम्युनिस्ट विचारों से काफी प्रभावित थे उन्होंने रूस की यात्रा के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा पत्र को तमिल में अनुवाद कर प्रचारित किया| वह अम्बेडकर के विचारों से सहमत थे पर जब वह संबिधान सभा का हिस्सा बने तो उन्होंने उनको राजनीति से प्रेरित बताया उन्होने अंबेडकर की पुस्तक 'एनीहीलेशन ऑफ कास्ट' का भी तमिलभाषियों के लिए अनुवाद किया था|
अन्नादुरई और पेरियार
जिन राजाजी ने उन्हें कांग्रेस में जोड़ा था, जब उन्होंने मद्रास के मुख्यमंत्री बनने के बाद हिंदी अनिवार्य कर दी तो उन्होंने 1937 में तमिल भाषी लोगों पर हिंदी थोपने का विरोध किया यही से द्रविड़ों के लिए अलग क्षेत्र द्रविडनाडु की मांग उन्होने की थी| वह बाल विवाह, विधवा प्रथा के विरोधी थे उनका मानना था, कि शादी को पवित्र न मानकर समानता का गठजोड़ समझना चाहिए, उनका मानना था, कि स्त्री और पुरुषों को शादी के लिए खुद पार्टनर चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, उनकी स्त्रियों के लिए खुले वातावरण की सोच का ही प्रभाव था, कि उन्हें महिला सम्मेलन में पेरियार की उपाधि मिली थी, इसका मतलब पवित्र आत्मा होता है|
के. कामराज और पेरियार
जब पेरियार ने एक नवयुवती से विवाह कर लिया तो उनके समर्थक अन्नादुरे ने उनसे अलग होकर डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) बना ली जो कि पेरियार के दल द्रविड़ कजगम का विभाजन था, अन्नादुरई तमिलनाडु के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे, इन्होने द्रविड़ों के लिए अलग देश द्रविड़स्तान का नारा दिया था, इन्होने डीएमके में ब्राह्मणों और उत्तरभारतीयों को भी जुड़ने दिया, द्रविड़ आंदोलन को आधी सदी तक जीवित रखने वाले करूणानिधि इन्हीं के राजनीतिक वारिस थे| पेरियार द्रविड़ अस्मिता के ऐसे नायक है, जिन्होने कभी फोर्ट सेंट जॉर्ज (तमिलनाडु विधानसभा) में जाने के लिए संघर्ष नहीं किया बल्कि वह व्यवस्था परिवर्तन के हीरो थे, के कामकाज ने जब कांग्रेस को संभालने के लिए मद्रास की सत्ता को छोड़ा तब से पेरियार के विचार ही सत्ता पर काबिज रहे हैं, 24 दिसंबर 1973 को पेरियार ने 94 वर्ष की आयु में देह छोड़ दी कबीरपंथी विचार की तरह पेरियार विचार सामाजिक पुनरूत्थान के लिए आज भी जीवित है|
जयललिता और पेरियार








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