सौभाग्य

हमारी अम्मा (दादीजी) घर में संयोगवश 29 अग्रस्त को गिर गई थी, जिसके कारण उन्हे LBS ( लाल बहादुर शास्त्री) hospital में भर्ती कराया गया था, मेड़ीकल जाँचो में पता चला कि इनके बांए पांव के उपरी हिस्से (कमर के पास) फैक्चर हैं, व मांथे में गम्भीर चोट आई थी, व छ: महीने के अंतराल में हदृयाघात (major heart attack) आया था|
डॉक्टरी इलाज व 9 दिन आई.सी.यू में रहने के बाद अम्मा अब ठीक हैं, दवाइयों के साथ- साथ परिजनों की दुआएं व ईश्वरीय कृप्या ही हैं, कि 93 वर्ष की आयु में भी वह इस शारीरिक अस्थिरता की स्थति से उबर गई|


हमारा सौभाग्य कहिए या अम्मा से आत्मीय जुड़ाव की उनसे अस्पताल में उनकी खूब सारी कहानियां सुनने का अवसर फिर हमे प्राप्त हुआ | अम्मा का जुझारूपन और दृढ़ इच्छाशक्ति देखकर मैं हमेशा अचंभित रह जाता हुँ| अभी भी (हॉस्पीटल में भर्ती होने के पूर्व) उनमें जोश -ए-जुनन मेरा आत्मविश्वास हमेशा बढ़ाता हैं|
मेरा और मेरे भाई का बचपन से लालन पोषण मेरी  अम्मा ने ही किया हैं, अभी भी (पिछले महीने तक) जब घर में खाना बनाने वाली अंटी नहीं आती थी, तो अपने कांपते हाथों से किचन का मोर्चा वो खुद सम्भालने लग जाती थी, जब मैं घर पर विश्वविद्यालय से आती था, तो दो कच्ची पक्की रोटी और आटे से सन्नी हुई अम्मा दरवाजे के सामने सोफे पर मेरा इंतजार करती नजर आती थी और मेरे आते से ही कहती थी पिंकु अब मेरी उम्र हो गई , खाना भी नहीं बना पाती, फिर जब मैं उनको दुलारता तो कहती बेटा भूख लग रही हैं, खिचड़ी बना दे |
मेरा सौभाग्य ही करेगे कि जिन्होने मुझे बचपन में नहलाया, प्यार का निवाला खिलाया उन अम्मा की इस अवस्था में भी मुझे उन्हे नहलाने और हाथ से रोटी का कोर तोड़ कर खिलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ|
डॉक्टर कह रहे थे, कि यह उपचार में सक्रिय योगदान तो दे रही है, पर अधिक उम्र होने के कारण यह शारीरिक रूप से शायद ही सक्रिय हो पाए|
हमारी अम्मा मंगो देवी शर्मा जब अठारह साल की थी, तब चार दरवाजे वाले कस्बे नुमा हमारे भोपाल में जब महिलाएँ यहां चादर औढ़ कर चलती थी, तब वह अंग्रेजी दासता के विरूद्ध जेल गई थी, बाबा की मृत्यु के बाद उन्होने अकेले ही पिताजी का पालन पोषण किया, खुद को शिक्षित किया और आयुवेद्विक वेद्य तक की शिक्षा ग्रहण की 32 रूपये की अपनी मासिक आय में घर का किराया, पुत्र का लालन पोषण और समाजसेवा यह तीनो कार्य अम्मा कैसे करती होगी, यह हम भौतिकवादी मानवों के लिए काल्पनिक ही हैं| उन्होने 1992 तक 78 वर्ष की आयु तक जैन सेवार्थ औषधालय में चिकित्सीय सेवा  दी फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की अपनी सम्माननिधी से जीवन यापन प्रारंभ कर दिया| मैं अक्सर दादी से पूछता था, कि अम्मा क्यों खुद को कष्ट्र देकर इन कार्यक्रमों में जाती हो, अक्सर अम्मा चुप्पी साध लेती थी ,पर दो वर्ष पहले उन्होने मुझे ऐसा उत्तर दिया कि मैं वह हमेशा सभी को बताता फिरता हुँ, अम्मा ने बोला कि इन दो चार कार्यक्रमों में जाकर चाहे कुछ क्षणों की देशभक्ति को देखकर ही मेरी उम्र एक साल और बढ़ जाती हैं| न जाने कितने किस्से, कहानियां याद आते है, जो अम्मा से मैने सुने है, या फिर मेरे संस्मरणों में दर्ज है, 90 वर्ष की आयु में भी वैष्णो देवी के दर्शन यह कहते हुए पैदल पैदल दुर्गम रास्तों में कर गयी, कि किसी पर बोझ बन मैं तीर्थ यात्रा नहीं करूगी और उनके जोश और जुनन से वह जीवनपर्यन्त लबरेज रही, मैने उनको अपनी बुद्धि आने के बाद ही उनका अनुसरण करा पर मैने उनको अंग्रेजी में हस्ताक्षर से लेकर हाथ कांपने के कारण अंगूठा लगाने तक की यात्रा का आत्मसात जरूर किया | कामना हैं, कि घर के इस बरगद की छाँव में जितने भी दिन हो , सब ऐसे ही प्रेरणादायक हो , जैसे अब तक के व्यतीत होते आए हैं|
उस बुजुर्गं की उँगलियों में कोई ताकत ना थी मगर,
जब मेरा सिर झुका,तो सिर पर रखे काँपते हाथों ने ज़माने भर की ताकत दे दी...!

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