बचपन

अपने जल जाने का भी अहसास नही था
जलते हुए शोलो को चिढायॉ करते थे
अब तो इक ऑसु भी रूसवा कर देता है
बचपन मै तो जी भर के रोया करते थे !!

प्रेम रत्न धन पायो फिल्म का एक संवाद है जिसने साथ में बचपन जीया मतलब भागवत व रामायण के समान है |

बचपन यानि क्या जीवन का सबसे अच्छा समय, परिवार के सदस्यों की छाया में, दोस्तो की टोली में , सच्चे मन से झुठ बोलने में , टीचर की प्यार भरी डॉट में बचपन की छोटी सी दुनिया इन्ही आनंदों से भरी हुई है |
बचपन की छोटी सी दुनिया में आसमान रूपी छत के नीचे चाँद सितारो की चादर ओढकर माँ की लोरी और कहांनिया सुनते हुए जो नीद आती थी वह दुनिया की किसी दौलत से खरीदी नही जा सकती |
बचपन में दोस्त मतलब से नही शरारत से बनते , बच्चे कितनी भी मस्ती क्यो न करले उनकी माँ की डॉट बच्चे की मासुमियत देखकर मुस्कान में तब्दील हो जाती है|

बच्चों की दुनिया  में किसी से रूठा नही जाता और रूठे तो तुरन्त मनाया जाता है बच्चो मे बेरभाव की कमी ही उनकी मासुमियत ,नादानी को उभारती है |

बच्चों की सही रूप तो सुरदास के कृष्ण है जो अपनी माँ से बडे भाई की शिकायत करते है अपने भाई को डाँट पडवाना चाहते है और उनकी माँ उनके बालक की तोतली वाणी सुन सुन कर हर्षित हो रही है |

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥
कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥
सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥
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