गोवर्धन पूजा - भारत की प्रकृति पर आस्था
भारत में प्राचीन काल से ही ज्ञान का संवर्द्धन प्रारंभ है सीधे लफ़्जों में प्राचीन भारतीयों को हर विषय का ज्ञान था, जिसका उन्होने वेदों , उपनिषदों, शास्त्रो, पुराणों में वर्णन किया हैं| पर भारत के लोगो ने कभी अपने लिए नीतिशास्त्र की रचना नहीं की, कि भारतीयों को धर्मसंगत क्या करना चाहिए और क्या नहीं यह कहीं भी भारतीय मनीषियों ने नहीं लिखा बल्कि उन्होने दो चरित्रों को भारत का आर्दश नायक कहां एक हैं सूर्यवंशी त्रेतायुगीन श्री राम व एक है द्वापरयुगीन यदुवंशी कृष्ण |
एक को उन्होनें मयार्दा पुरूषोंत्तम राम कहा और
एक को लीला पुरषोत्तम कृष्ण कहा|
क्योकि यहा गोवर्धन पूजा पर वर्णन किया जा रहा है इसलिए हमे पूर्ण पुरूषोत्तम कृष्ण जिनके जीवन की एक-एक प्रसंग (लीला) स्वयं में विस्तृत हैं| एक सात वर्षीय बालक द्वारा प्रारंभ की गई यह गोवर्धन पूजा भारत का प्रकृति पर आस्था प्रदर्शित करती है|
गोवर्धन का शाब्दिक अर्थ होता हैं गौ यानि गाय का वर्धन करने वाला | गोवर्धन पर्वत जिसकी कृष्ण के कहने पर गौकुल के ग्वालो ने कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा यानि दीपावली के दूसरे दिन पूजा की थी वह पर्वत सात कोस यानि 21 किलोमीटर में फैला हुआ हैं और पूरे ब्रजमण्डल में वर्षा वितरण का कारण था और गायो की पिपासा भी पर्वत की घास को चरकर ही शांत होती थी | कृषि और गॉय के उत्पादों पर जिन ग्वालों की आजीविका निर्भर थी उन ग्वालों के लिए यह पर्वत एक वरदान के समान ही फलित होता है यह सब विशेषता बताकर ही कृष्ण ने वर्षा के देवता इन्द्र ,जो कि देवताओं का राजा है उसके स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की | कृष्ण जो कि द्रव्यता लिए हुए एक बालक वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन और रूढिवादी परम्पराओं का इस प्रक्षेप में चुनौती देता है इस प्रसंग में कृष्ण गौमाता व गौवर्धन की पूजा कर गौकुल (गाय का कुल, परिवार) और प्रकृति के मध्य अपन्त्व व संबंध स्थापित करने का प्रयास था | वह गाय जिसमें ३३ कोटि देवता निवास करते है जिसके गौबर तक में माँ लक्ष्मी का वास है उस प्रकृति माता की अनमोल देन गौमाता की पूजा की थी |
आज परिस्थिकी विपरीत है क्योकि हम प्रकृति से दूर और विलासिता की और अग्रसर है हम आधुनिकता की दोड़ भाग में अपनी धरती माँ से दूर होते जा रहे है | भारत जो पहले गॉवो में वसता था अब वह गॉव अर्द्धशहरी कस्बों में तब्दील हो चुके है |
आज घर में पूजे जाने वाले गोबर के गणेश एक ओछी उक्ति बनके रह गए है |
पहले गाय को रोटी खिलाकर घर में खाना बनता था और अब गाय की रोटी न ही बनती है और बनती भी है तो क्या गाय तक जाती है या कूडे के ढ़ेर में पाई जाती हैं | गौरक्षा यह बात भारत में जब उठकर आयी जब हमने अपनी माता को भी एक भोग की वस्तु के रूप में माना |अब हमारी आत्मीयता गाय के साथ नहीं अपितु पैकट बंद दूध की तरफ ज्यादा है |
सुना है देश में स्मार्टसिटी का निर्माण हो रहा है पर स्मार्ट सिटी में गाय को बाधेगे कहा यह सवाल मेरे दिमाग में कौतुहल मचाए हुआ है |
गाय की एक लात चरणरज से एक मंदबुद्धि संस्कृत का विद्धान कालिदास बन गया पर पता नही गाय के गोबर को देखकर मुँह सिकोडने वाली गोपी घर मे गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजेगी भी क्या ?
आधुनिकता के फेर में
क्या पूज्ये जाएगे गोबर के ढेर ?
( इसी सवाल के साथ मेरे विचार समाप्त )
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें