भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया (कविता)

भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया
गिरते आंसू को पोछता वह हाथ मेरा ही था
रोज रोता था मैं कि काश कोई हो मेरा
नींद खुली तो देखा अक्स मेरा ही साथ था
शब्द मेरे सुनकर खिलखिलाता बस मैं ही तो हूं
क्या जरूरत अब किसी की मेरा दोस्त मैं ही हूं।

भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

भूख होती है क्या, यह समझता कौन है
जब‌ भी पेट सुकडता दौड़ता लंगर में मैं
मंदिर का प्रसाद, दरगाह का सीरा 
मुझको यह समझा गया, धर्म बस है उन्हीं का
पेट जिनका भर गया, हम भूखे तो बस  सेक्यूलर है
खाना देख रब याद आ गया
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया



जान आई हाथ में जब, बर्तन मेरे साथ थे
चाय की टपरी पर लड़के, अब भी मुझे याद है
उनकी चाय, मट्ठरी तफरी को देख मैं मुस्करा दिया
नाम मेरा बस तभी से स्माइल लबों पर आ गया
कोई छोटू, कोई लड़का कहकर मुझे पुकारता है
फटी पन्नी उस ठेले पर बिछाकर मैं सो गया
बस तभी से मुझे घर बसाना आ गया।
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

रोज इक बड़ी सी गाड़ी टपरी के सामने आती थी
मेरी उम्र की लड़की उसमें से नजर आती थी
बस वही सामने स्कूल में वह पढ़ा करती थी
स्कूल में जाकर मुझे चाय बांटना याद है
गणेश माससाब को चाय की प्याली देना याद है
तभी वही कक्षा में वह लड़की आई थी
क्या पता उस दिन मुझे रोग लव का हो गया
चाय की प्याली गिरी या किस्मत मेरी फूट गई
वहां रखी डंडी से मुझको माससाहब ने  खूब धुना
पिटते पिटते मुझको रोना रोना आ ही गया
वो ही मेरा दौर ए स्कूल का आखरी प्रवेश था
हम गरीबों को किताबें कहा सिखाती है सबक
गाली ताली और तमाचा बस यही हमे देते ज्ञान है
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

नौकरी छूटी या दूंजी खुटी से मैं बंध गया
दस रूपए रोज अब मुझे मिलती पगार थी
तब्बा मिया महल के सामने इक दुकान थी
बस वही पर तखत बैठा बच्चा मैं ही तो हूं
रास्तों से निकलती बाजियों को मैं वहां बुलाता था
मुझे लगा जैसे कि पहली बार मुझमें ज़ुबां आई है
सूट डेलीवेयर पार्टीवेयर लीजिए आपा मैं बोलता था
दूर से बुर्के में जाती वो अम्मा मुझे याद है
उसकी दी मिठाई मेरा पहला गिफ्ट थी
वो वहीं पर एक दिन और आई थी
उसके नाति राशिद से खैरात मैने पाई थी
पहली बार नये कपड़े तभी मैंने पहने थे
सफेद कुर्ता पजामा  पहन कर मैं इठला गया
तभी झापड़ मालिक का मैंने उसी दिन खाया था
उसने मुझको ईदी में दो चार चांटे थे दिए
उसके गल्ले से किसी ने दो चार सौ पैसे लिए
बस तभी कपड़े पहनने से मैं दूसरे की चोरी में
चोर बनकर आ गया, तभी पहली बार मुझको स्माइल चोर कहकर बुलाया गया।
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

मालिक मेरा दिल का पर बहुत अच्छा था
मुझ बेसहारा को उसने पहली मर्तबा एक खोली में ठहरवाया था
काली सलाखों वाली उल जेल में मेरी दोस्त किताबे बनी
बस तभी रूपल मेंडम ने मुढको पढ़ना सिखला दिया
बस तभी से जाहिल स्माइल पढ़ने लायक हो गया
वहां पर रोजाना  अंकल दीपक नेमा आते थे
बाद में वह मुझको लेकर घर अपने चल दिए
तब से यह अभागा स्माइल का सरनेम नेमा बन गया
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

उनके सबरीनगर वाले घर में मेरा बचपन ढ़ल गया
खूब लाड़ प्यार मेरे पापा ने मुझे दिया
वह दारू की भट्टी में काम करते थे
रोज पीकर दारू वह मुझे प्यार करते थे
उनकी आंखों को देखकर मैं डरने लगा
नशे में उन्होंने इक दिन मेरी कमर को दर्द दे दिया था
मुंह में चिंदी लगाकर मुझे ऐसा दर्द दिया
दो दिन तक मैं स्माइल कमरे में बंद रहा
दिन में उसी कमरे में अंधेरे को मैंने अपने अंदर जाते देखा
उस दिन से खुद को मैने स्माइल अंधेरा नाम दे दिया
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

अभी  उम्र पन्द्रह थी मेरी पचपन गम जिंदगी ने दिए
फिर भी यह स्माइल तजुर्बे दार है, आंसू बहाना छोड़ कर
मैने मुस्कुराहट ओढ़ ली, रात को बिस्तर के नीचे चाकू मैने रख लिया
कभी उस चाकू को मैने अपनी गर्दन से मिलवा दिया
जब सफेद निशान उस जगह आ गया, तब मैं डर सहम कर फूट कर रोने लगा, एक चांदर से मैंने यह गला जकड़ा दिया
पर सांस जाती देख हाथ उससे हट गया
चादर छुटी सर से उसे सुकुडकर मैने समेट ली
बस तभी दौड़ा मैं घर  से , रास्ते भर रो चला 
चलते चलते उस सड़क पर , कुत्तों को भोंकना याद है
काटते झटपटाते, सूंघकर मुझको डराते
पर उनसे मुझे डर कम लगा, पर में उन बेजुबान जानवरों से क्या डरता में, मैं बेचारा तो बोलने वाले जानवर का शिकार था
 रास्ते भर उस जहन्नुम का वह नजारा याद है
बाहर ही था या मेरे अंदर पर वो दर्दनाक मंजर साथ है
पास में इक पटरी पुलिया से सटी हुई दिखी
बदबू नाले की मेरी नाक में धंसी हुई मिली
सोचा स्माइल चढ़ जा यह रेल तेरे लिए है रूकी 
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

ट्रेन में बिना टिकट के मैं सवार हो गया
मुझको टीसी ने देखा पूछा बेटा क्या हो गया
उसका पूछना था और रोना मेरा शुरू हो गया
उसने मुझे गले लगाकर ऐसा जादू कर दिया
झर झर कर सारा लावा आंसू की शक्ल में बाहर मैंने कर दिया
न मैंने उसे कुछ कहा न उसने मुझसे फिर कुछ पूछा
ट्रेन रूकी मंजिल पर अपनी पर नई राह मुझको मिली
एक भगवान के घर में मुझे अनाथ को डगर मिली
अब मैं पढ़ता हूं, खेलता हूं, इठलाता हूं
दोस्तो के बीच खूब मुस्कुराता हूं
देखा अंधेरों में इक प्रकाश का दिया
समय की करवटों ने मुझे बहुत कुछ दिया
मैं मिला खुद से अपने ड़र के बिना
भीगी भीगी पलकों को इक सहारा मिल गया

शुभम शर्मा

टिप्पणियाँ

  1. कहानी ने दिल छू लिया😁🤗🤗

    जवाब देंहटाएं
  2. अति उत्तम जितना भी कहा जाये उतना कम अतुलनीय
    वास्तव में तुम महान हो लगे रहो सफलता🏆💪 जरूर मिलेगी
    जय हिंद

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

न्याय की देवी की आंख पर पट्टी क्यों?

मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं (1930 के दशक की कहानी)

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,