चूड़ी तो बस श्रृंगार है उसका, वो तलवार चलाना भी जानती है |
चूड़ी तो बस श्रृंगार है उसका, वो तलवार चलाना भी जानती है |
जब मुश्किलो में घिरते हम हौसला बढ़ाना भी जानती है,
गुस्सा, प्यार- दुलार, डाँट
कभी बेलन से भी देती मार
पर रोता देख बच्चे को वह पुचकारना भी जानती है |
चूड़ी तो बस श्रृंगार है उसका, वो तलवार चलाना भी जानती है |
किसी उम्र में किसी वेश में
रूककर, झुककर, सम्भल-सम्भलकर
साथी को भी साथ चलाना जानती है वह,
चूड़ी तो बस श्रृंगार है उसका, वो तलवार चलाना भी जानती है |
पहले सुनती ,फिर कुछ कहती
खट्टी-मिट्ठी बातो में चटकारा लेना जानती है
चूड़ी तो बस श्रृंगार है उसका, वो तलवार चलाना भी जानती है |
जब हार मान ले पुरूष वीर
वह युद्ध में कौशल दिखलाना भी जानती है
जौहर करती ,युद्ध में लड़ती
वह दुश्मन को पौरूष दिखाना भी जानती है |
चूड़ी तो बस श्रृंगार है उसका, वो तलवार चलाना भी जानती है |
शुभम शर्मा
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