लीला पुरूषोत्तम :- श्री कृष्ण

हमारे भारतवर्ष में सबसे ज्यादा सनातन धर्मी जिस ईश्वर विशेष की उपासना करते है वह है भगवान विष्णु के नौवे अवतार यदुवंशी वासुदेव जी और माता देवकी के आठवे पुत्र श्रीकृष्ण जिन्हे भारत के जनमानस में लीलापुरूषोत्तम कहां गया है |

जब चंद्रमा पूर्णिमा पर अपने पूरे शबाव पर निकलता है तब वह सौलह कलाओं से पूर्ण होता है ,श्रीकृष्ण को भी सौलह कलाओं का स्वरूप माना गया है यही कारण है कि वह पूर्ण पुरूषोत्तम कहलाएं |
श्रीकृष्ण का रूप , उनकी लीलाएं ,उनका वेश , उनका व्यवहार सब अपने आप में काफी विवधता लिए हुए है |

"जाकि रही भावना जैसी
प्रभु मूर्त देखी तिन तैसी |"
कोई कृष्ण के बालस्वरूप में माखनचोर के रूप उन्हे निहारता है ,तो कोई बंशीबजाकर रासरचाने वाले के रूप में, कोई तिजली उंगली से गोवर्धन उठाने वाले गिरधारी के रूप में ,तो कोई युद्ध छोड़कर भागने वाले रणछोड़ के रूप में, कोई द्वारका के राजा द्वारकाधीश के रूप में , तो कोई गाय चराने वाले गोपाल के रूप में, कोई उन्हे प्रेम की मूर्ति के रूप में राधाकृष्ण के रूप में पूजता है तो कोई गीता के ज्ञान देने वाले कृष्ण के रूप में पूजता जपता है |
कृष्ण के रूपों को , उनकी लीलाओं को एक कलम से पाटना बेमानी है वह तो वह मीरा का गिरधर है जिसकी चाह में चैतन्य महाप्रभु

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी
हे नाथ! नारायण वासुदेवा |

की धुन पर नाचते झुमते  कृष्ण को रिझाते है, सूरदास की मन की आँखे जिन कृष्ण को माँ यशोदा के वात्सल्य से सराबोर पाती है |
कृष्ण को ढुढते हुए रसखान गोवर्धन में बस जाते है, महाप्रभु जी उन्हे सांदीपनी आश्रम उज्जैन से लेकर जगनाथपुरी तक खोजते हुए नाथद्वारा राजस्थान में सूरदास के पदो से रिझाते है, मीराबाई अपने मोरमुकट वाले पति को पाने केलिए अंतत विष का प्याला पी कर नृत्य करते हुए कृष्ण में समा जाती है | कृष्ण के मित्र सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के कहने पर उनसे मिलने द्वारका जाते है और वह द्वारका का राजा पाण्डवो के धर्म की रक्षा के लिए अर्जुन के रथ का सारथी बनकर कुरूक्षेत्र में रथ चला रहा होता है |

कृष्ण जब महाराष्ट्र के सोलापुर से रूकमणी का हरण करके लाते है तो ऋषि दुर्वासा के रथ को खीच रहे नवदम्पति रूकमणी -कृष्ण ही थे , दूसरी तरफ उनकी पत्नी सत्यभामा उन्हे नारद मुनि को उनके वजन का स्वर्ण  दान करने मे अपने पूरे जवाहरात चढ़ा कर थककर अंतत: वह तुलसी के पत्र से उन्हे तोलकर अपना सकल्प पूरा करती है , जिस जामवंत ने रामअवतार में उनकी सहायक की भूमिका अदा की थी वह अपने वरदान के रूप में इस जन्म में उन्हे से युद्ध में पराजित होकर अपनी पुत्री जामवंती का विवाह उनसे करवाता है |

कृष्ण की लीलाओं की कोई सीमा नहीं है कोई रुप नहीं है लीलापुरूषोत्म श्रीकृष्ण के लिए एक कथन ही पर्याय है 'कृष्णम् वन्दे जगतगुरू" इति|

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