जरा याद करो कुर्बानी
हम भारतीयों की आस्था प्रतीक चिन्हों में ज्यादा केन्द्रित रहती है | हमे हमारे अस्तित्व के बारे में हमेशा दूसरे व्यक्ति ने जागृत किया है |
रामायण काल में जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का अहसास कराया और वह अपने सामर्थय को समझकर समुद्र लांघ कर लंका पहुँचे थे |
ठीक वैसा ही अस्तित्व जागरण का काम महाभारत में अर्जुन का गाण्डीव गिरते देख श्रीकृष्ण ने किया था |. आद्यशंकराचार्य को शास्वत ज्ञान भी एक चण्डाल ने ही दिया था |
थोड़ा अटपटा लगता है पर यह सच है कि हमे हमारे बारे में हमेशा दूसरा ही बताता है हम अपनी उदासीनता के कारण कभी स्वयं को जान ही नहीं पाते है |. हमे अग्रेजी हुकूमत से आजाद हुए 70 वर्ष हो गए है हमारी आजादी अब वृद्ध हो गई है, हमें आजाद होते देखने वाली कई आँखे अब बंद हो चली हैं | हमारे बीच उन लोगो की तादाद ज्यादा है जो आजाद भारत में पैदा हुए है, यह वह पीढ़ी है जिन्होने कभी न भारत माता को अंग्रेजी दासता की जंजीरो में जकड़ा देखा है , ना ही उन जंजीरो को तोड़ते क्रांतिकारियों को लाठी, गोली खाते देख अपने दिल को न सीने से बाहर आते देखा है |. फाँसी के तख्तो पर जब कोई क्रांतिकारी झूलता था तोह उनके शहीदी पर जंगे-ए-आजादी में प्रवेश करते युवाओं की भीड़ हमने नहीं देखी है |.
हां हमने स्वतंत्रता के संघषों को सिर्फ इतिहास की किताबों में पढ़ा है वो भी पास होने के लिए फिर हम स्वतंत्रता के मूल्यों से परिचित कैसे हो सकते है? शहीदों के जीवन को देखने वाली आँखे ,उनके किस्से कहांनिया कहने वाली बहुत सी आवाजे मौन हो गई है| जो जीवित है हम उनसे अनभिज्ञ है| इससे ज्यादा दुभाग्य हमारा क्या होगा कि सरकारी दफ्तरों में काम कर रहे अधिकारीयों को जब यह भी नहीं पता कि freedom fighter (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) का अर्थ क्या होता है फिर आप बाकी भोले-भाले भारतीयों को तो छोड़ ही दीजिए |
हमारे भोपाल में दो-तीन साल पहले तक 70 के करीब स्वतंत्रता सेनानी जीवित थे अभी 2016 में 14(सरकारी आंकडे) सेनानी ही जीवित है ; जो है वह घर के अलावा सिर्फ बैंक या अस्पताल ही जाते है एक जगह ईलाज के लिए दूसरी जगह जीवित होने का प्रमाण पत्र लेकर सम्मानिधी का भोगी बनने के लिए वरना बाकि समय वह अपनी खटिया पर लेटे-बैठे अंग्रेजो द्वारा दी गई यातनाएँ और अपनी जवानी के दिनो की याद में ही खोए रहते हैं |
यह भी बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि अधिकतर सेनानी जब देह त्यागते है तब १५ अग्रस्त या २६ जनवरी के आसपास का ही समय होता है , इसके पीछे कारण यह है कि इस समय राष्ट्रीय पर्वो के शोरगुल में उनकी भावनाएं जोरो पर होती हैं |
मैने एक सेनानी से पूछा अम्मा तुम अपने को पीड़ा देकर आजादी के जलसो में क्यो जाती हो? उनका जबाव था कि मैं इसलिए जाती हुं कि वहां आए लोगो के देशभक्ति के जज्बे को देखकर मेरी उम्र एक साल और बढ़ जाती है मैं और यादे सहेज लेती हुँ |
जब आजादी का रणबांकुरा प्राण त्यागता हैं तो उनकी राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई की प्रथा हैं | पर कई मरणोपरांत सेनानी ऐसे भी हुए है, जिनके परिवार में कोई नहीं था प्रशासन को उनकी मृत्यु की सूचना देने वाला वह स्वयं ही तिरंगा छोड़ गए थे अपने घर में कि जब वह प्राण त्यागे तो कम से कम उनके शव पर वह तिरंगा जरूर हो जिनकी शान के लिए उन्होने अपनी जवानी कुर्बान की है|
हमारे भोपाल में पंडित मोतीलाल नेहरूजी, दादा माखनलाल चतुर्वेदी, जनाब बरकतउल्ला भोपाली, मास्टर लाल सिंह जी, शंकर दयाल शर्मा जी समेत अनेक आजादी के मतवालो के नाम पर स्मारक और शिक्षण संस्थान मौजुद है आवश्यकता है तो उनके बलिदान को याद रखने की ताकि हमारे मनो मस्तिष्क में लगे अज्ञानता के जाले साफ करने के लिए हमें दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता न पड़े | अंतत: हमारी चेतना ही हमारे अस्तित्व और पूवर्जो की विरासत को इस धरा पर जीवित रखेगी |
"है लिये हथियार दुश्मन, ताक में बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं; सीना लिये अपना इधर।
खून से खेलेंगे होली, गर वतन मुश्किल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।
देखना है ज़ोर कितना, बाज़ु-ए-कातिल में है |"
क्रांतिकारियों की भावना रामप्रसाद बिस्मिल जी के शब्दों में
समर्पित अम्मा मंगो देवी शर्मा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
अब एक और जामवंत की जरुरत है ।।
जवाब देंहटाएंशानदार लेखन
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