मैत्री की राह बताने को , सबको सुमार्ग पर लाने को , दुर्योधन को समझाने को , भीषण विध्वंस बचाने को , भगवान् हस्तिनापुर आये , पांडव का संदेशा लाये। ' दो न्याय अगर तो आधा दो , पर , इसमें भी यदि बाधा हो , तो दे दो केवल पाँच ग्राम , रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे , परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका , आशिष समाज की ले न सका , उलटे , हरि को बाँधने चला , जो था असाध्य , साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है , पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया , अपना स्वरूप-विस्तार किया , डगमग-डगमग दिग्गज डोले , भगवान् कुपित होकर बोले- ' जंजीर बढ़ा कर साध मुझे , हाँ , हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख , गगन मुझमें लय है , यह देख , पवन मुझमें लय है , मुझमें विलीन झंकार सकल , मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें , संहार झूलता है मुझमें। ' उदयाचल मेरा दीप्त भाल , भूमंडल वक्षस्थल विशाल , भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं , मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर , सब हैं मेरे मुख के अन्दर। ' दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख , मुझमें सारा ब्रह्म...
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