पछतावा
अक्सर मुझे मेरे परिचित्त संचेत करते है कि मैं लोगों को घूर कर या यू कहे की गुस्से वाली नज़रों से देखता हुँ ़
हां भाई हो सकता है कि यह मेरे अंदाजे - ए - बय़ा का जऱिया बन गया हो पर अपने शुभचिन्तकों की इस सलाह को मैं हमेशा से नज़रअंदाज ही करते आया हुँ कि "ऐसी गुस्सेल नज़रो से लोगों को ना देखा करो |"
पर कल घटे एक वाक्ये ने मेरी आँखों पर बधी पट्टी खोल दी |
कल मेरी आवासीय कॉलोनी से एक कार्यक्रम में शामिल होने जल्दी में लम्बे कद़म रखते हुए मैं जा रहा था, तब ही पीछे बेटमिन्टन खेल रही एक बालिका जो उम्र में मुझसे कम से कम 4-5 साल छोटी रही होगी मुझे उसका स्वर सुनाई दिया कि "तुम लोग ऐसे क्यों घुरते हो कि खा ही जाओगे ?"
उसके साथ खेल रही लड़की ने बोला कि "क्या लड़कीयों को " यह घटनाक्रम मेरी आँखों के सामने कुछ सामान्य से क्षणो में ही घट गए पर यह सामान्य से क्षण मेरी स्मृति में आसामान्य से बन गए कि मुझे उस छोटी बहन जैसी बालिका ने सच्चाई का आँयना दिखा दी और मेरी चुप्पी ने मुझे ग्लानि की भावना से भर दिया मैं अपनी ही नज़रों में गिर गया था कि सिर्फ मेरी दृष्ट्रि ने ही उस लड़की को चोट पहुँचाई यह क्षमायाचना का तो समय नहीं है पर उस अपरिचित्त लड़की के एक कथन ने मेरे देखने के तरीके को बदल दिया है आज मैने दिन भर अपने देखने के तरीके में बदलाव किया और हँसकर देखने की कोशिस की वैसे भी कहते है दिन में एक बार मुख पर सरस्वती का वास होता है और अगर उस छोटी बहन की एक बात नें मेरी एक कमी को दूर करने में सहायता की तो इससे बढ़िया और क्या हो सकता है |
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