लीला


हम भारतवासी यू तो खुब प्रगति कर चूके है बेलगाड़ी से मेट्रो तक के सफ़र में हमारे देश में काफी बदलाव आए है पर न जाने क्यो यह छुआ-छुत की कु प्रथा कही न कही छोटे या बड़े स्तर पर देखने को मिल ही जाती है , यह कुप्रथा ही आपसी सद्भाव में खटास पैदा करती है , हम मंगल तक जाने की सोचते है पर ऊँच-नीच , अगड़ा- पिछड़ा के स्तर से स्वयं को उबार नहीं पाए है, हम सभी को पता है कि श्री राम ने माता सबरी के झुठे बैर खाएं थे आज ऐसी ही एक सच्ची दिव्यता लिए हुए घटना से आपको रुबरू कराना चाह रहा हुँ ....

मथुरा में गोकुल एक गॉव है और वहॉ एक प्राचीन मन्दिर है गोकुलनाथ जी( कृष्ण) का मन्दिर हैं मन्दिर में गोकुलनाथ जी बालकृष्ण रूप में विराजमान है जिनका आकार मानव अँगुठे जितना ही हैं और उनका श्रंगार उनके आकार से कई गुना बड़ा किया जाता है |
यह मन्दिर बल्लभकुल सम्प्रदाय.  का आस्था का प्रतीक है |
बल्लभकुल के अन्य मन्दिरों की तरह भी गोकुलनाथ जी को विभिन्न भांति के व्यंजन भोग लगाए जाते है..
एक दिन मुखिया जी ने भोग में प्रभु को कढ़ी का भोग नहीं लगाया और दोपहर की आरती कर गोकुलनाथ जी को शयन करा दिया | पूरे गोकुल में उस दिन कही भी कढ़ी नहीं बनी तो एक बुढ़ी कृष्णभक्त मेहतरानी के घर पतली बिना पकोड़ी वाली कढ़ी बनी थी उस बुढ़िया ने कढ़ी उदला ( पत्थर के पात्र ) में रख दी | बुढ़िया के नाती ने जब उस बुढ़िया से बोला कि अम्मा ! भुख लगी है तो बुढ़िया ने बोला कि जा लाला ! उदला में से कढ़ी ले ले | जैसे ही बालक ने चमच उदला में डाली जो उसमें से गोकुलनाथ जी निकले तो बालक ने अपनी दादी को कहा कि अम्मा देख कढ़ी में क्या मिला ? तो बुढ़िया देख कर समझ गयी कि यह गोकुलनाथ जी है और कढ़ी खाने की खातिर उसकी चौखट पर आए है |

वही मन्दिर में जब संध्या आरती के लिए मुखिया जी ने पट खोले
तो उन्होने देखा कि ठाकुर जी तो गायब है उन्होने गोसाई जी के बताया कि ठाकुर जी गायब है |
फिर गोसाई जी नंगे पांव उस मेहतरानी के घर गए और वहा से बुढ़िया के पांव पढ ठाकुर जी को वापस मन्दिर लाए और तब से ही वहां रोजाना बिना पकोड़ी की कढ़ी रोजाना भोग में लगने लगी जो निरन्तर जारी है |

जब ऊपर वाला हम सब में भेदभाव नहीं करता तो फिर हम क्यों उसके बनाए मानव को नीचा दिखाए उनसे भेदभाव करे भगवान भी ऐसी लीलाओं से अपने अस्तित्व और अच्छी जीवन शैली की सीखे हम सबको देता है |
       इतिश्री

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