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प्रेम और धुव्र तारा

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आप गुस्सा हो, बात मत करो जायज है, नाराजगी रिश्तों की कीमत बताने में मददगार होती है पर समय के साथ यह न बात करना बड़ी दूरियों को निमंत्रण देती है, आप मुझसे मेरी बात का ही रिर्फेश देकर बात न करने का बोली हो, अगर कहने में सार्थकता है, तो सुनने में भी समझ ही है, मुझे एक बात बताओ आपको मालूम है, कि आपके पालक आपके जीवन में चिरस्थाई और बरगद की छांव की तरह तो क्या आप उनकी महत्ता को नकार देगी, तो फिर किस प्रकार मैं आपके स्थायित्व को अन्यथा ले सकता हुं, आप मुझपर गुस्सा हो, क्रोध में हाथ उठाओं , मुझसे बात मत करो, कब तक नहीं करोगी यह आपका निर्णय है, पर मैं उस बुलबुले की तरह हुं जो सिर्फ पानी में आकार लेता है, अग्नि या मृदा में नहीं, आप शायद मुझे मृगतृष्णा समझ बैठी हो पर जल में मृगतृष्णा नहीं होती, पानी की सबसे बड़ी इकाई समुद्र होती है, पानी के जहाज उसी से एक देश से दूसरे देश में जाते हैं| दुनिया खोजने में समुद्र का यातायात काफी मददगार सिद्ध हुआ है, जब अंधेरे में चारों तरफ जल ही जल हो और जहाज चालक के पास दिशाय्ंत्र का अभाव हो तब प्रकृति रास्ता दिखाती है, धुव्र तारा वह प्राचीन प्रकृति द्वारा प्...

50 वर्ष तक द्रविड आंदोलन के नेता रहे करुणानिधि की कहानी, 94 वर्ष की आयु तक जीवित रहे तीन ट्रेंड सेंटर नेताओं की कहानी

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94 वर्ष की उम्र में देह त्यागने वाले तीसरे नेता जो ट्रेंड सेंटर के तौर पर तमिलनाडु ही नहीं अपितु पूरे देश पर छाप छोड़ गए है, वह 94 वर्ष के उन तीन ट्रेंड सेंटर नेताओं में तीसरे और महत्वपूर्ण नेता रहे है, जिन्होने तमिल जनमानस के दिलों पर राज किया| 3 जून 1924 को जन्मे मुत्तुवेल करुणानिधि वह शख्सियत थे जो 2012 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद 5 वर्षों तक विधानसभा नहीं गए थे (विधायक के रूप में शपथ लेने के अवसर को छोड़कर) कारण यह था, कि वह अधिक उम्र हो जाने के कारण शारीरिक अपंगता के कारण विधानसभा जाने में सक्षम नहीं थे उसके बावजूद भी वह 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में पूरे तमिलनाडु में सर्वाधिक वोटों से थिरूवरूर सीट से विजयी हुए थे| यह वह जनसमर्थन था जो उनके साथ उम्रभर जारी रहा, जब वह चेन्नई के कांवेरी हॉस्पिटल में अस्वस्थता के कारण दाखिल हुए थे, अस्पताल के बाहर खड़ी हजारों की तादाद में भीड़ उस द्रविड नेता की सुख दुख की साथी थी, जो 50 वर्षों से या यू कहे कि अन्नादुरई और पेरियार की मौत के बाद द्रविड़ आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा था| वह 13 बार विधायक 5 बार मुख्यमंत्री और अपराजित राजनेता थे जो क...

एशिया का सुकरात जिसके विचार तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज है, 94 वर्ष के तीन ट्रेंड सेंटर नेताओं की कहानी

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इवी रामास्वामी पेरियार 94 वर्ष के ट्रेंड सेंटर द्रविड़ नेता तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करूणानिधि की मौत 94 वर्ष की आयु में हुई और उन्हें चेन्नई के मरीना बीच में दफनाया गया, उनके राजनीतिक गुरु और द्रमुक के संस्थापक अन्नादुरई को भी दफनाया ही गया था, साथ ही एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता और उनको राजनीति सिखाने वाले एम जी रामचंद्रन को भी दफनाया ही गया था| यह मृत्यु के बाद की अंतिम संस्कार की प्रक्रिया और दफनाया जाना द्रविड़ आंदोलन और उसके संस्थापक इ.वी रामास्वामी पेरियार से शुरू हुआ है, यू तो करुणानिधि और जयललिता कट्टर विरोधी थे, पर वह उस राजनीतिक विचार को फॉलो कर रहे थे, जिसके जन्मदाता पेरियार (17 सितंबर 1879 - 24 दिसंबर 1973) ही थे| अन्नादुरई, करूणानिधि, एमजी रामचंद्रन और पेरियार  पेरियार यह नाम दक्षिण की राजनीति में एक ट्रेंड सेंटर के रूप में लिया जाता है, यह भी 94 साल की उम्र में दफनाएं गए  थे, वह अपनी जिंदगी में द्रविड़ अस्मिता का विचार छोड़ गए, जिसे लोगों ने द्रविड़ राष्ट्रवाद करार दिया, पर रावण को अपना नायक मानने वाले यह नेता ब्राह्मण आडंबर रीति रिवाज और अंधवि...

रायसीना हिल्स में राजेंद्र प्रसाद के पहले रहे नेता की कहानी (94 वर्ष की उम्र के तीन ट्रेंड सेंटर नेता)

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94 वर्ष के दो नेता पेरियार और राजगोपालाचारी तमिलनाडु की सत्ता का पांच बार स्वाद चख चूके करूणानिधि का निधन जब 7 अगस्त 2018 को हुआ तो एक दफा फिर से दक्षिण की राजनीति के लिए लुटियन्स हिल्स के प्रशंसकों की दिलचस्पी जगी कि किस प्रकार 94 वर्ष तक एक द्रविड नेता पूरे राज्य का दुलारा बना रहा, जब वह 2016 में थिरूवरूर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए तो तमिलनाडु में रिकॉर्ड वोटो से जीते थे, यह भी संयोग है कि तमिलनाडु के तीन ट्रेड सेंटर मुत्तुवेल करुणानिधि ( जन्म 3 जून 1924 - मृत्यु 7 अगस्त 2018), इ. वी रामास्वामी पेरियार (जन्म 17 सितंबर 1879 - मृत्यु 24 दिसंबर 1973) और चक्रवर्ती  राजगोपालाचारी (जन्म 10 दिसंबर 1878 - मृत्यु 25 दिसंबर 1972) तीनों का ही निधन 94 वर्ष की उम्र में हुआ था और तीनों ने सिर्फ तमिलनाडु की ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव किए है, तीनों की दूरदर्शिता, सोच और संघर्ष का लोहा पूरे देश ने माना है|                   94 वर्ष के ट्रेंड सेंटर नेता करूणानिधि भारत जब आर्यावर्त के नाम से जाना जाता था, त...

राष्ट्रपति ने ज्योतिषियों से पूछकर प्रधानमंत्री को शपथ का समय दिया

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फोटो 16 जनवरी 1991 की है जब देश के उपराष्ट्रपति होने के नाते माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा जी ने देश को समर्पित किया था, आज उनकी 100 वी जयंती है,  जन्मशताब्दी पर शंकर दयाल शर्मा जी को नमन्                शंकर दयाल शर्मा एक ऐसी शख्सियत जो राजनीति में   आये नहीं लाए गए थे, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में वीआईपी रोड पर एक बड़ी सी मूर्ति मुख्य मार्ग पर थी, बचपन से वह मूर्ति दिखा करती थी, कई प्रश्न जहन में थे, कि शहर की सबसे बड़ी मूर्ति किस की है, उनके एक हाथ में किताब को देखकर यह जरूर समझ में आता था, कि वह मां सरस्वती के उपासक रहे होगे, धीरे-धीरे समझ विकसित हुई तो पता चला यह मूर्ति भारत के नवें राष्ट्रपति रहे डॉ शंकरदयाल शर्मा की है, मध्यप्रदेश की धरा से निकला एक मात्र व्यक्ति जिन्होंने भारत के सबसे बड़े पद को धारण किया, भोपाल के गुलिया दाई के मोहल्ले में 19 अगस्त 1918 को जन्मे शंकर नबाव भोपाल के वजीफे पर केंब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़े और फिर वहां छात्रों को पढ़ाया भी| केंब्रिज विश्वविद्यालय ...

अठखेलियां

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नींद मानो खो सी गई है, कोई प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर खोजने की जिज्ञासा हो, न ही प्रेम में मन वसा है, एक अजीब सा अहसास अंदर ही अंदर परेशान कर रहा है, शायद यह एकांत या अकेलेपन का लक्षण है, कभी लगता है, डॉक्टर से परामर्श लु, कभी मन करता है यहां से भाग जाऊं, बिना लक्ष्य के जीवन का कोई मोल नहीं है, आशा और निराशा के बंधन से मुझे मुक्त होना है, पर मेरी पतंग पता नहीं किस डोर से बंधी हुई है और उसकी ढ़ील न जाने कौन दे रहा है, मैं बोरियत के फिशटेक में फंसी मछली की स्थिति में हुं, मेरे पास जीने लायक सभी सुविधाएं है, पर मुझे समुद्र चाहिए जिसकी अथाह लहरों में मैं अठखेलियां कर सकू, हां बड़ी मछलियां मेरा शिकार कर सकती है, मछुआरों का ड़र भी मुझे सताएगा पर मैं अपनी खुद की मौत मरना चाहता हूं, मैं खुद के चश्मे से दुनिया देखना चाहता हूं, दूसरे के बताए नजारों को मैं उसकी सोच सा ही पाउंगा|  जब आठवी कक्षा में था, तब एक शिक्षिका खाली पीरियड में आई, खाली पीरियड में आये शिक्षक हमेशा सबको अपनी मनमर्जी करने की छूट देते है, मनमर्जी वह भी अनुशासन की दहलीज में पर वह नई उम्र की शिक्षिका कुछ नया सिखाने आई थी...

जब बंदूकें खामोश हो जाएंगी, जब खिलेंगे धरती पर फूल

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वाजपेयी जी यू तो संसार से विदा 16 अगस्त 2018 को अपराह्न 5 बजकर 5 मिनट पर हुए पर 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद वह एक दम से राष्ट्रीय राजनीति के फलक से ओझल हो गए थे, वह 2009 तक लखनऊ लोकसभा सीट से सांसद थे, पर संसद में उनके भाषणों से 2004 के बाद देश सुनने को तरस रहा था, 2009 के लोकसभा चुनाव में जब अटल जी के बाद लालकृष्ण आडवाणी पीएम इन वेटिंग के तौर पर उभरे तो खराब स्वास्थ्य के कारण लखनऊ लोकसभा सीट से सांसद के तौर पर वाजपेयी जी का लड़ना मुश्किल था, तो उनके सहयोगी रहे लालजी टंडन को वहां से लड़ाया गया वह जीते भी पर अटल बिहारी जी के शब्दों के बाणों से अब देश की राजनीति की रणभूमि दूर हो चली थी, पहले पहल यह खबर आती थी, कि वाजपेई जी के जन्मदिन पर यानि 25 दिसंबर को राज्यों के मुख्यमंत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी उन्हे शुभकामनाएं देने चले जाते थे, पर वह कुछ वर्षों से लोगों को पहचानने से भी इंकार कर देते थे, जब 2015 में उन्हे भारत रत्न देने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी उनके कृष्णा मेनन मार्ग स्थित निवास पहुंचे तो उनका चेहरे के आगे एक जवान सामने आ गया था, मुझे याद है, कि सब उस जवान को ...

आजादी

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आज पहली मर्तबा तिरंगे को लहराते हुए नहीं देखा, हर बार भोपाल के लालपरेड मैदान पर मुख्यमंत्री द्वारा  झंडा वंदन को लाइव देखा है, हर्ष फायर के साथ टुकड़ियों में बजती राष्ट्रगान जन-गण-मन की धुन में तीसरी बार खडा हुआ जाता है, यह उद्घोषक सलामी मंच के पीछे से बोलते हैं, पर उसके बावजूद लोग बेसुध से तीनों बार खड़े हो जाते है और उनके पीछे पीछे सभी लोग पर अपन नाज से दो बार बैठे रहते थे, वहीं वर्षो का अनुभव जो ठहरा, शायद होश संभालने से अब तक हर स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम जो देखा है, सलामी मंच पर मुख्यमंत्री का आना ,उन्हे कमाण्डर द्वारा सलामी देना, ध्वजारोहण कर गुब्बारे हवा में छोड़ना, पुलिस महानिदेशक के साथ खुली जीप में बैठकर परेड़ की सलामी लेना और जनता का अभिवादन स्वीकारना फिर मुख्यमंत्री का संदेश पढ़ना और एकाएक लोगों का कुर्सी से उठकर संदेश की प्रति पर झपेटा मारकर झीनना, मुख्यमंत्री द्वारा पदक बांटना और एकदम किसी स्काउट गाइड के बच्चे का परेड की थकावट के बाद मैदान में गिरजाना, झांकियों को देखकर बच्चों का खिल उठना सब दृश्य इन आंखों में समाए है, मुख्यमंत्री के बगल से लगी कुर्स...

मां खादी की चादर दे दे मैं गांधी बन जाऊं

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मां खादी की चादर देदे मैं गांधी बन जाऊं, सभी के जीवन में एक प्रेरक प्रसंग या घटना होती है, जो उनके जीवन को बदल कर रख देती है, मैं अक्सर  गांधी बनने की ख्वाहिश को दिल में समाये रहता हूं, जब अंकूरावस्था में थे और पहले स्कूल में दाखिला लिया  तो वह गांधी ज्ञान मंदिर हाई स्कूल था, जहां दसवी कक्षा तक ही कक्षाएं लगती थी, शायद जिज्ञासावश ही गांधीजी को वहां देखा, सुना, समझा था, पर वह सतही ज्ञान था, जिसका कोई ठोर ठिकाना नहीं था, गांधी बापू की पहली छवि जो उभरी थी, वह हाथ में लाठी लिए खादी की धोती पहने हुए थी, शायद यहां ख्वाहिश गांधी बनने की नहीं, उनका जैसा दिखने की थी| अस्सी प्रतिशत लोग विचार को नहीं वेशभूषा को अपनाते हैं, गांधी जी ने एक टोपी का प्रयोग प्रतीक के रूप में किया, भारत छोड़ो आंदोलन में हर 17 या 18 साल का बच्चा गांधी टोपी पहने खुद को गांधीजी जैसा महसूस करता होगा, शायद इसीलिए यह गांधी टोपी कहलायी, आज संघ के स्वयंसेवक काली टोपी पहनते है, कांग्रेस के कार्यकर्ता सफेद टोपी, भाजपाई भगवा और समाजवादी लाल टोपी में खुद के सर को ढ़के हुए है| अन्ना के 2013 में हुए भ्रष्टा...

मिलने की ख्वाहिश

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मेरा 22 वा बर्थडे 22 जुलाई को था और ठीक एक दिन पहले मैं नरसिंहपुर स्टेशन पर खड़ा यह सोच रहा था , कि जयपुर जाने की जुगत कैसे बिठाई जाए , यूं तो दो महीने पहले तक जयपुर से मेरा कोई नाता नहीं था , पर   अब मेरी दुनिया वहां बसती है , यू तो हमने फिल्मों में खूब प्यार को देखा है , पर असल जिंदगी में वह अब अनुभव हो रहा है , प्यार साथ में हो तो बेहिसाब खूशी मिलती है , पर अगर   दूर हो तो मिलने की तड़प   भी होती है , यह शायद उस जंगल के पेड़ की प्यास जैसी स्थिति है , जो एक लोटे पानी में नहीं बुझती है जो सिर्फ बारिश में ही बुझती है , उसे सालभर इंतजार करना पड़ता है अपनी तड़प को मिटाने के लिए मैं यह   प्यास लेकर राजस्थान गया था | यू तो हम कनेक्टिविटी के नायाब दौर में जी रहे है , पर वीडियो कॉलिंग और मैसेज की दुनिया में मिलने का सुख कहां , न उनमें आलिंगन संभव है न हाथ पकड़ पाने की खुशी | यह मिलने की ख्वाहिश लिए जयपुर जाना था पर वहां के लिए मेरे नए ठिकाने नरसिंहपुर से कोई ट्रेन नहीं है , तो मुझे हमारे जन्मस्थान भोपाल से ट्रेन पकड़नी थी , यही हमारा प्यार भी परवान चढ़ा था , जहां तीन ...