मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं (1930 के दशक की कहानी)
मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं यह कहते हुए बाबा ने पान की बेगम की तुरुप चलकर मेरे हुकम के इक्के की बंती को नहीं बनने दिया और दहला पकड़ की उस चाल में बाबा और अम्मा की जोड़ी जीत गई और मैं(मंगों) और मेरे बिड़ू नत्था नाना हार गएं, अम्मा उठी और अपने समधी और भाई के लिए पानी का लोटा लाई, बाबा ने एकटक मुझे घूरा मैं उतने मैं उठकर अम्मा की मदद करने लग गई, बाबा के चेहरे के भाव देखकर समझ आ रहा है, कि वह कह रहे है अपनी बुर्जग दादी की मदद कर। दो दिन बाद मेरा गोना होने वाला है, हमारे दसविसा गोवर्धन वाली बाखर में मेहमानों का तांता सा लगना अभी से प्रारंभ हो गया है। यूं तो हमारे जिझोतिया ब्राह्मण गोत्र के घर में जिजवानों का आना जाना आम सी बात है पर इस बार यह भीड़ गिरराज जी की परिक्रमा के लिए नहीं बल्कि मेरे गोने में शामिल होने इक्टठा हुई है। हमारा परिवार राजस्थान के दो रजवाड़ो अजमेर और भरतपुर के कुलपुरोहितों का है, उन के क्षेत्र के यात्री जब भी पूर्णिमा पर गोबर्धन आते है, हमारे घर ही रुकते है, हम उनकी खूब खातिरदारी करते है, बदले में मुंहजुबानी बोल जा...