कलम के सिपाही
नासमझी और उतावलेपन में उठाये गये...... . . "कदम","कलम"और "कसम" तकलीफ ही देते हैं... कलम की असली ताकत तो इन पत्रकारों ने भावी पीढ़ी को सिखाई है
जीवन भर कलम की सेवा करने वाले पत्रकार जो कि एक स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न हिस्सा सा बनकर उभरे है इन पत्रकारों के पत्रों के माध्यम से ही जनक्रांति बनकर उभरी थी स्वतंत्रता आंदोलनों के नेताओं की बातो को जनसामान्य तक अखबारो ने ही पहुचाया था शायद यही कारण था कि उस समय सभी नेताओं ने समाचार पत्र प्रकाशित किए थे |
देश में ऐसे पत्र निकले जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना में बड़ा योगदान दिया। जिनको हम आज देश के बड़े-बड़े नेता मानते हैं, उन्होंने जनता को नेतृत्व, समाचारपत्रों के माध्यम से ही देना शुरू किया। 15 नवम्बर, 1851 को श्री दादाभाई नौराजी ने गुजराती में ‘रास्तगुफ्तार‘ नामक पत्र निकाला था। राजा राममोहन राय का ‘बंगदूत‘ जो एक-साथ बंगला, हिन्दी, फारसी और अंग्रेजी में छपता था, सन् 1857 में पयामे आज़ादी के नाम से उर्दू तथा हिन्दी में एक पत्र प्रकाशित हुआ जो अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का प्रचारक था और जिसको ज़ब्त कर लिया गया था।
‘हिन्दू पेट्रियट‘ नामक समाचार पत्र 1853 में श्री गिरीशचंद्र घोष ने प्रकाशित किया बाद में इस समाचार पत्र की बागड़ोर ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने की इसके अलावा बाल गंगाधर तिलक ने केसरी और मराठा ,लाला लाजपत राय ने पंजाब केशरी और गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप जैसे समाचार पत्र प्रकाशित कर जनसामान्य में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका तैयार की |
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