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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाई मध्यप्रदेश को सांस्कृतिक अभ्युदय की राह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाई मध्यप्रदेश को सांस्कृतिक अभ्युदय की राह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भारत की अस्मिता, संस्कृति और संस्कारों के संरक्षक हैं, उन्होंने देशभर में सांस्कृतिक अभ्युदय का महामंत्र दिया है। भारत की नवनिर्मित संसद में सेंगोल की स्थापना उनके इस दृष्टि का रूपक था। देश के दिल मध्यप्रदेश को भी प्रधानमंत्री जी ने सांस्कृतिक अभ्युदय की राह दिखाई है। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में नए भारत का निर्माण और भारतीय सभ्यता का सम्मान बढ़ रहा है। सांस्कृतिक विरासत का गौरव गतिमान हो रहा है। काशी कॉरिडर की तरह भव्य लोकों का निर्माण उज्जैन में महाकाल महालोक ओरछा में भव्य राम राजा लोक चित्रकूट में दिव्य वनवासी रामलोक सलकनपुर में श्री देवी महालोक महेश्वर में अहिल्या लोक जानापाव में परशुराम लोक दतिया में पीतांबरा माई महालोक जामसावली में हनुमान लोक मां नर्मदा को समर्पित मध्यप्रदेश नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नदी है, यह नदी लोक आस्था में मां तुल्य है। मध्यप्रदेश में उनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उल्लेखनीय कार्य हो रहे हैं। नर्मदा के संरक्षण के लिए जन जागरूकता...

शिव समय के देवता

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पूर्णिमा पर चांद जब निकलता है, वह सोलह कलाओं से निपुण होता है, सुहागिन स्त्री भी सोलह श्रृंगार करती है, पर शिव अट्ठारह श्रृंगार करते हैं, शिव को अवधूत कहा जाता है, अवधूत यानि स्वयं शिव, जिसके श्मशान भूमि और राज भूमि एक सी हो, जो मल और मांस दोनों खा सकता हो. हमारे यहां संतो की सबसे बड़ी डिग्री अवधुत ही है, भगवान दत्तात्रेय भी अवधूत थे और रामकृष्ण परमहंस भी. अवधूत संयास की वह अवस्था है जहां मोक्ष पाने के लिए नहीं बल्कि मोक्ष दिलाने के लिए साधना की जाती है. शिव को लेकर एक बात कहीं जाती है कि वह संहार के देवता हैं, महाकाल के काल को मौत मान लिया जाता है जबकि वह समय के देवता हैं, उनको ढंग से देखिए समय यानि क्या? भूतकाल, वर्तमान और भविष्य. शिव की तीन आंखें हैं, उनके माथे पर त्रिपुण है, उनको बेलपत्र भी तीन पत्तियों वाली चढ़ाई जाती है. बीच का सिरा वर्तमान है और बाकि बाकि दो सिरे भविष्य और भूत है. वर्तमान का सिरा हमेशा स्थिर होता है, बिल्कुल सीध में जिसे एक मंत्र ओम् तत् सत् से जोड़ सकते हैं, जिससे आशय है कि हम आज में ही जी सकते हैं बाकि भविष्य और भूत के विषय में सोचकर हम निश्चित और आ...

दूरियां ज़रूरी हैं

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दूरियां ज़रूरी हैं इक दूजे को समझने के लिए. यह सलाखें, यह पाबंदियां उन जिंदगियों की असलियत है जो बंद है कारावास में वर्षों से. उनकी खुशियों का रास्ता है यह झरोखा, जो लाता है उन तक उनके अपनों की महक और फिर मिलने की आस.

गोरा रंग श्रेष्ठ कैसे

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राक्षसों के शरीर का का रंग काला है वही देवता श्वेत वर्ण के है, भगवान को भी हम गोरे काले रंग से तोलते है, सूर्य देवता को उनके पुत्र पसंद नहीं थे क्योंकि शनि देव अश्वेत थे. जब बचपन से हमें साहित्य में बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला जैसी कहावतें सिखाई जाती है तो यकीनन हम काले रंग को नीच और बुराई का प्रतीक मानने लग जाते है, हमारे समाज में गोरे रंग की एक सत्ता है, जो जन्म से ही श्रेष्ठ घोषित हो जाती है, सड़कों पर हमें दुपट्टा बांधे महिलाएं दिख जाती है, विकास की दौड़ में कहर बरपाती धूप से बचती इन महिलाओं को धूप से नहीं काले होने से डर लगता है, यदि गोरे रंग की मालकियत समाप्त हो गई तो ब्यूटी प्रोडक्ट के कई धंधे बंद हो जाएंगे, किसी व्यक्ति के शरीर का रंग भद्दा कैसे हो सकता है? जबकि विश्व इतिहास में गांधी, नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक इस श्वेत सिंहासन को हिलाने में अपना समय देते है, फोटोशॉप के जरिए खुद को ब्यूटीफुल दिखाने के लिए खुद को गोरा करता समाज पिछड़ेपन में जीता है, यह पिछड़ापन उस गुलामी का ही रूपक है, जो गोरों की गुलामी करता है, हम भी बड़े अजीब है, हमे शरीर का रंग गोरा चा...

मुझे भीड़ पसंद नहीं है

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मुझे भीड़ पसंद नहीं है, न मुझे भीड़ में खड़ा होना भाता है न ही मुझे भीड़ को ताकना पसंद है फिर भी मेरा सच यही है कि मैं भीड़ में ही कहीं शामिल हूं. लोग अक्सर गांव से शहर की ओर जाते हैं, मैं शहर से गांव गया था, वो भी पत्रकारिता करने मैंने गांव को जितना भी जाना समझा है इस तमगे के साथ जाना है. पत्रकारिता करनी है, यह मैंने पांच साल पहले सोचा था. सोचते ही माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में एडमिशन ले लिया, वहां गया तो पत्रकार बनने था पर वहां नेता (छात्र नेता) ज्यादा समझा गया. इस नेता शब्द को मिटाने के लिए अखबार, चैनल के दफ्तर खंगालने लग गया, आखिरकार मुझे देर सवेर इस शब्द से अब छुट्टी मिल चुकी है. मैं किस्मत में बहुत मानता हूं, कई बार मेहनत से ज्यादा और कई बार उसके बराबर भी, मैंने किस्मत को कभी भी मेहनत से कम नहीं आंका है. ऐसा क्यों है? इसके पीछे अब तक की पूरी 23 साल की जिंदगी है. एक बात जो मेरे साथ परछाई की तरह जुडी है, हम अक्सर देखते हैं कि हमारे मम्मी पापा से झगडे होते हैं जो खत्म इस लाइन पर होते हैं कि आप मुझे नहीं समझ सकते. यह लाइन मैंने कभी नहीं कहीं क्योंकि जिन्होंने मेरी परवरि...

कर्नाटक विधानसभा में हुए इस विवाद को समझने के लिए जानना होगा आखिर फर्जी/असली सेनानी क्या बला है?

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कर्नाटक विधानसभा में एक अजीब वाकया घटा जब बीजेपी विधायक बासनगौड़ा पाटिल यतनाल के एक बयान पर विवाद खड़ा हो गया, विधायक यतनाल ने पिछले दिनों एच. एस दौरेस्वामी को फर्जी स्वतंत्रता सेनानी कहा था। यतनाल के शब्द थे, "कई फर्जी स्वतंत्रता सेनानी हैं, एक बैंगलोर में भी हैं, हमें अब बताना पड़ेगा कि दौरेस्वामी क्या हैं? वह वृद्ध कहा हैं? वह पाकिस्तान के एजेंट की तरह व्यवहार करते हैं." गौरतलब है कि दोरेस्वामी अक्सर राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ बयान देते रहते हैं. जिसको लेकर वह विधायक के निशाने पर थे, वैसे उन्होंने जिस फर्जी सेनानी कहकर दौरेस्वामी को घेरा है, वह समझने के यह फर्जी सेनानी क्या होता है? अगर विधायक फर्जी सेनानी हैं, तो फिर असली सेनानी क्या होता हैं? दरअसल हम हर साल स्वतंत्रता दिवस तो बड़े उत्साह से मना लेते हैं वहीं स्वतंत्रता सेनानी क्या होते हैं? इसका सही - सही ज़बाब हमारे पास नहीं है, जो हम थोड़ा बहुत उस शब्द का अर्थ लगा लेते हैं, वह यह है कि जो व्यक्ति अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा था वह स्वतंत्रता सेनानी हैं. लेकिन सरकार की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द की परिभाषा ...

सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान

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सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा, यह लाइन यू तो फिल्म देवता के एक गीत की है. आज यह लाइन दिल्ली के उस दौर में काफी मार्मिक होती दिखती है, जहां सारी लड़ाई मजहब की दीवार पर साम्प्रदायिकता के रंग से रंगी गई थी. रह रह कर 72 घंटे चली इस हिंसा के ज्वार में हमने क्या खोया ? जब इस सवाल पर मंथन दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में ढूंढने की कोशिश की जाती है, तो तिरंगे के रंग को भगवा और हरे से पाटने की गुस्ताखी साफ नजर आती है. हमारे पूर्वजों की गंगा जमुनी तहज़ीब 42 जिंदगियों के खून से धुल गई है. कहते हैं दिल्ली देश का दिल है, जब दिल धड़कता है, तो शरीर जिंदा है, यह अहसास होता है, वही दो रोज पहले जब देश के दिल की गलियां पत्थर और ईट के टूकडों से पटी पड़ी थी. तब देश चैन की सांस कैसे जी रहा होगा, देश खुश होने का दिखावा कर रहा होगा, वही वह भीतर ही भीतर दर्द से कराह रहा होगा, वह दर्द जो मन को कचोट देता है, किसी अपने के खोने की वह पीड़ा जो किसी अपने के चेहरे को बस यादों में ही देख सकती है. हकीकत में नहीं. कहते हैं दुनि...