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कर्नाटक विधानसभा में हुए इस विवाद को समझने के लिए जानना होगा आखिर फर्जी/असली सेनानी क्या बला है?

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कर्नाटक विधानसभा में एक अजीब वाकया घटा जब बीजेपी विधायक बासनगौड़ा पाटिल यतनाल के एक बयान पर विवाद खड़ा हो गया, विधायक यतनाल ने पिछले दिनों एच. एस दौरेस्वामी को फर्जी स्वतंत्रता सेनानी कहा था। यतनाल के शब्द थे, "कई फर्जी स्वतंत्रता सेनानी हैं, एक बैंगलोर में भी हैं, हमें अब बताना पड़ेगा कि दौरेस्वामी क्या हैं? वह वृद्ध कहा हैं? वह पाकिस्तान के एजेंट की तरह व्यवहार करते हैं." गौरतलब है कि दोरेस्वामी अक्सर राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ बयान देते रहते हैं. जिसको लेकर वह विधायक के निशाने पर थे, वैसे उन्होंने जिस फर्जी सेनानी कहकर दौरेस्वामी को घेरा है, वह समझने के यह फर्जी सेनानी क्या होता है? अगर विधायक फर्जी सेनानी हैं, तो फिर असली सेनानी क्या होता हैं? दरअसल हम हर साल स्वतंत्रता दिवस तो बड़े उत्साह से मना लेते हैं वहीं स्वतंत्रता सेनानी क्या होते हैं? इसका सही - सही ज़बाब हमारे पास नहीं है, जो हम थोड़ा बहुत उस शब्द का अर्थ लगा लेते हैं, वह यह है कि जो व्यक्ति अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा था वह स्वतंत्रता सेनानी हैं. लेकिन सरकार की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द की परिभाषा ...

सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान

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सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा, यह लाइन यू तो फिल्म देवता के एक गीत की है. आज यह लाइन दिल्ली के उस दौर में काफी मार्मिक होती दिखती है, जहां सारी लड़ाई मजहब की दीवार पर साम्प्रदायिकता के रंग से रंगी गई थी. रह रह कर 72 घंटे चली इस हिंसा के ज्वार में हमने क्या खोया ? जब इस सवाल पर मंथन दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में ढूंढने की कोशिश की जाती है, तो तिरंगे के रंग को भगवा और हरे से पाटने की गुस्ताखी साफ नजर आती है. हमारे पूर्वजों की गंगा जमुनी तहज़ीब 42 जिंदगियों के खून से धुल गई है. कहते हैं दिल्ली देश का दिल है, जब दिल धड़कता है, तो शरीर जिंदा है, यह अहसास होता है, वही दो रोज पहले जब देश के दिल की गलियां पत्थर और ईट के टूकडों से पटी पड़ी थी. तब देश चैन की सांस कैसे जी रहा होगा, देश खुश होने का दिखावा कर रहा होगा, वही वह भीतर ही भीतर दर्द से कराह रहा होगा, वह दर्द जो मन को कचोट देता है, किसी अपने के खोने की वह पीड़ा जो किसी अपने के चेहरे को बस यादों में ही देख सकती है. हकीकत में नहीं. कहते हैं दुनि...

थप्पड़ फिल्म लाश को बोलते हुए दिखाती है

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ओशो कहते हैं "सबको बीबी लाश जैसी चाहिए." थप्पड़ फिल्म उस लाश के बोलने की कहानी है. फिल्म में स्लो ड्रामा है, एक थप्पड़ के सीन में ही बस नाटकीय पक्ष दिखता है. फिल्म की हीरोइन अमृता है, जो अपनी मां जैसी हाउस वाइफ बनने की ओर है, वह अपनी मां के नुस्खों पर हंसती है, वही वह अपने पति की जरूरी मीटिंग से पहले उसकी जेब में पर्ची रखने की कोशिश करती है, क्योंकि उसे विश्वास है अपनी मां की उस बात पर कि ऐसा करने से उसका काम हो जाएगा. फिल्म का नाम थप्पड़ है, जो थप्पड़ अमृता के गाल के साथ - साथ उसकी अस्मिता पर भी पड़ता दिखता है. फिल्म के मैसेज को समझने के लिए सिर्फ महिला किरदारों के संवाद ही काफी है. एक अमृता के पिता को छोड़ दिया जाए तो यह पूरी मूवी महिलाओं की कहानी कही जा सकती है. ओशो की बात पर गौर करें तो बीबी तो एक लाश है, जो बच्चे पैदा करती है, अपनी सांस की डायबिटीज चेंक करती है, सुबह मोबाइल पर्स लिए अपने पति को कार तक बिठाने आती है. जब बात पत्नी की इच्छाओं की आती है, तो वह तो सिर्फ एक लाश है. लाश को कहा बुरा लगता है, बुरा लगेगा भी तो क्या कर लेंगी? थोड़ा सा रो लेंगी, घर का सामान बिखेर ल...