मेरा वेलेंटाइन जो अब जिंदा नहीं है
बहुत सारी बातें थी जो दिल ही दिल में रह गई या यूं कहें होठों से बाहर ही नहीं निकली, जब आंख
बंद करता हूं तो लगता है बहुत कुछ बताने को था बहुत कुछ करने को था पर अम्मा अब तुम देख नहीं पाओगी,
अगर देखती भी होगी तो मैं तुम्हारे हाव-भाव कैसे समझु
कि तुम खुश हो या दुखी घर से निकलने से पहले जब तुम्हारा आशीर्वाद तुम्हारा हाथ मेरे सर पर आता था तो लगता था कि कोई भी ताकत मेरा कुछ नहीं बिगड़ पाएगी मुझे ऐसा लगता था कि हां मेरे पीछे मेरी रीढ़
की हड्डी मेरी अम्मा है पर अब तुम इस लोक में ही नहीं हो, बहुत कुछ कहने को था बहुत कुछ समझने को था बहुत सारी बातें थी जो टुकड़ों टुकड़ों में मैं सोचता तो हूं पर कहूं कैसे?
मैं कागज में बंद करके रखता हूं, पर वह कागज
खोलने का साहस मुझमें नहीं है.
जब मैं घर के बाहर होता था तो मैं सिर्फ इसलिए जल्दी घर जाता था कि तुम घर में मेरा इंतजार कर रही होती थी. तुम
पड़ोसियों को परेशान कर करके बार बार फोन लगवाया करती थी, तुम्हारे चक्कर में सबके पास मेरा नंबर चला गया, तुम कहलवाती थी
कि बेटा जल्दी आजा, उस फोन का इंतजार अब तक
मैं कर रहा हूं, की तुम
फोन लगा कर बोले आजा बेटा तेरी याद आ रही है पर मैं जानता हूं यह अब नहीं हो पाएगा. मेरी
रातों की नींद ना जाने कहां खो गई है, कोई है ही नहीं बोलने को कि जो टोके की
बेटा तुझे नींद नहीं आ रही है क्या? मैं टाइम से खाना भी नहीं खाता हूं कोई है ही नहीं बोलने को बेटा खा ले ? सुबह उठकर बिस्तर सही करना घर से निकलते समय भगवान की पूजा करना सब अब दूर हो गया है या तभी मेरे पास था जब तुम मेरे पास थी।
बार बार तुम्हारा जिक्र लोगों से करता हूं आए दिन तुम्हारे किस्से याद करके हंसता रहता हूं पर अब मैं सिर्फ तुम्हारी बातें ही कर सकता हूं ना तो मैं तुम्हे देख सकता हूं न तो मैं तुम्हे सुन सकता हूं अभी यह मैं जब बोल कर लिख रहा हूं ना तब तुम्हारा चेहरा मेरी आंखों के सामने से गुजर रहा है। अभी 26 जनवरी गुजरी थी तब मैं लेट कार्यक्रम में गया था तब तक वहा झंडा वंदन हो चुका था मुझे को देखकर तुम्हारी याद आ रही थी कि वही
तिरंगे के सामने सलामी मंच के नजदीक तुम बैठी होती और जबरदस्ती राष्ट्रगान में खड़े होने की जिद करती पर अब यह सब यादें हैं जो सिर्फ मेरे पास है। मैं खुश हुआ उस दिन लेट कार्यक्रम में जाकर
अगर जल्दी जाता तो राष्ट्रगान के समय शायद आंसू निकल जाते
या खुद ही वह अजीब सी फीलिंग को महसूस करता जिसे मैं महसूस नहीं करना चाहता हूं अगर महसूस भी करना चाहता हूं तो मैं नहीं चाहता हूं कि लोग उसे देखकर मुझे कुछ कहे या कुछ पूछे.
मैं नहीं किसी को जवाब देना चाहता मैं खुद मैं खुश हूं या बहुत खुश हूं. 94 साल की उम्र काफी होती है जीने के लिए, इतना ज्यादा कौन जीता है पर मेरे हिस्से में तुम्हारी जिंदगी के सिर्फ
20 साल आए है पर क्या करें? अभी पिछले दिनों अकबर किताब पढ़ रहा था उसमें कुंभनदास का जिक्र है लगा कि यह तो वही को है जिनके बारे में अम्मा मुझे बचपन में बताया करती थी भक्तन को कहां सीकरी काम आवत जात पनिया टूटी बिछड़ गयो हरिनाम. फिर सोचा यह तो मेरे साथ भी हो रहा है बहुत सी बातें रात दिन दिल ना जाने क्या-क्या सिर्फ तुम्हें सिर्फ तुम्हें तुम्हें याद करता है। रह रह कर तुम्हारी बातें याद आती हैं अभी रात के 10:30 बज रहे थे मैंने केले खरीदे,
वहां एक अम्मा
खड़ी थी उन्हें मैंने राम राम बोला तो रह रहकर उनकी दबी सी आवाज में राम राम बेटा जब मैने सुना, याद आया की अम्मा तुम बताया करती थी कि तुम्हारी नानी आखिरी समय में डॉक्टर को राम-राम के कह कर मरी थी। शायद जैसे तुम अपनी दादी नानी मां पिताजी सब के बारे में बताया करती थी मैं भी सबको तुम्हारे बारे में बताया करूंगा किस प्रकार वैष्णो देवी में अम्मा 92 साल की उम्र में पैदल गई थी, कैसे वैष्णो देवी के मंदिर के अंदर जब तुम्हारे पांव में निकले छाले में से खून निकल रहा था तो मैने
अपशिष्ट पदार्थ के रूप में पड़ी प्लास्टिक की पन्नी को तुम्हारे पांव में बांधा था मेरे
आंसू निकल रहे थे. वह आंसू जो कृष्ण को सुदामा की बिबाई देखकर आये थे।
मुझे याद है की आखिरी बार तुम्हारे साथ जब राजभवन गया था तब तुम्हारी लाठी वही
अंदर रह गई थी, मैं भूल गया था क्योंकि व्हीलचेयर से तुम बाहर आ रही थी फिर वह एसडीएम मैडम
लाठी लेकर बाहर आ आई और बोली क्या हुआ लाठी भूल गए थे तुम, शायद तुम्हारी लाठी बता रही थी कि अब छोड़ दे मुझे, यही आखिरी घर से बाहर तुमहरी यात्रा थी,
मैं जब भी वीआईपी रोड के नजदीक से निकलता हूं मुझे याद आता है कि अम्मा के साथ बचपन में यहां से पैदल घूमता था ऐसी एक भी जगह नहीं छोड़ी अम्मा तुमने जहां पर तुम्हारी याद ना आए, यही कारण है कि भोपाल में मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं वहां किसी को ढूंढता हूं जो इस दुनिया में ही नहीं है। घर की हर चीज तुम्हारे हाथ से आई है, वह बिस्तर, वह पलंग, वह कूलर, वह पंखा सब कुछ।
जब तुम मटके में से ज्यादा पानी नीचे से निकलने पर उसने सीमेंट लगा देती थी खुद ही किचन और बाथरूम में सफेदी पोत दिया
करती थी, वो तीन मंजिल पर तुम्हारे साथ सीढ़ियां चढ़ना, जब मैं तुम्हें गोदी में उठा कर ऊपर ले जाता था तो तुम बोलती थी कि नहीं बेटा गिर जाएगा, जब आंख बंद करो तो तुम और
तुम्हारी सीखे सामने होती है,
तुम्हारी बातें याद आती है, जब किसी को किसी से ₹10 मांगते हुए देखता हूं तो लगता है उसे बताऊं कि मेहनत करना ज्यादा कामगर है, तुमने मुझे आत्मनिर्भर बनाया है बहुत कुछ है बोलने को पर किसे जाकर बोलू
बहुत सारा गुस्सा है जो अंदर ही अंदर भरा हुआ है पर जिसे में चाह कर भी निकालना नहीं चाहता। मेरे हिसाब से मैं बहुत खुश नसीब हूं कि जितना भी हो तुम्हारा साथ मेरे साथ था। तुम्हारे सुख दुख ढलती उम्र में मैं तुम्हारे पास था कभी कबार मन करता है कि मैं बाथरूम में नहाने जाऊं और मेरी अम्मा वहां कुर्सी पर बैठी हुई मिले और कहे बेटा नहला दे।
पर यह उस कवि की कल्पना जैसी ही बात है जो एक नदी को औरत की तरह देखता है. मेरा मन करता है तुम्हे बतायू कि तुम्हारी बात गलत साबित हुई ।
जब तुम गोवर्धन से आई थी तब तुमने आकर बोला था बेटा ज्योतिषी ने बताया है कि मेरी मौत गोवर्धन में होगी, पर
तुम्हारी मिट्टी
भोपाल की मिट्टी में ही मिली है, ब्रज की रज मैं भक्ति और प्रेम है पर तुम्हारा अख्खड़ पन उसमें कहां मिलता, तुम किसी की कभी मानती नहीं थी
हां तुम सोचती सबके लिए बहुत अच्छा थी शायद घर के बुजुर्ग ऐसे ही होते है, जो हर किसी की चिंता , हर किसी के लिए प्यार , हर किसी के लिए मुस्कान लिए होते है, लिखने को बोलने को समझने को बहुत कुछ है, कटरा स्टेशन पर एक्सीलेटर में ना चढ़कर तुम 50 सीढ़ियां चढ़ी थी काश फिर से वह मौका मिले, कभी कबार लगता है मैंने 22 साल के जीवन में 94 साल की जिंदगी भी देख ली, क्योंकि तुम मेरे पास थी वह तुम्हारा जिद करना कि बेटा मोदी को सुनना है जब लाल परेड ग्राउंड जाकर तुम्हारा सो जाना किसी बचपन वाली जिंदगी है, जो तुमने जी है। मिट्टी की पकड़ आसमान की चाहत और सब का भला शायद यही जिंदगी है। जैसा सोचो वैसी तो नहीं है यह दुनिया, यह रस्मों रिवाजों की दुनिया।
काश मैं यह सब तुम्हें बोल पाता तुम पक्का मुझे सीने से लगाकर खूब सारा प्यार करती, फिर कहती
बेटा
चाय बना ले, पर मैं यह सब तुमसे कह नहीं सकता और कहूंगा भी तो तुम सुन नहीं सकती
और अगर सुनती भी होगी तो तुम्हें मै तुम्हारा चेहरा कैसे देखूं? मुझे यकीन है कि मेरे कहे बिना तुम्हे
यह सब मालूम था| लव यू अम्मा
बंद करता हूं तो लगता है बहुत कुछ बताने को था बहुत कुछ करने को था पर अम्मा अब तुम देख नहीं पाओगी,
अगर देखती भी होगी तो मैं तुम्हारे हाव-भाव कैसे समझु
कि तुम खुश हो या दुखी घर से निकलने से पहले जब तुम्हारा आशीर्वाद तुम्हारा हाथ मेरे सर पर आता था तो लगता था कि कोई भी ताकत मेरा कुछ नहीं बिगड़ पाएगी मुझे ऐसा लगता था कि हां मेरे पीछे मेरी रीढ़
की हड्डी मेरी अम्मा है पर अब तुम इस लोक में ही नहीं हो, बहुत कुछ कहने को था बहुत कुछ समझने को था बहुत सारी बातें थी जो टुकड़ों टुकड़ों में मैं सोचता तो हूं पर कहूं कैसे?
मैं कागज में बंद करके रखता हूं, पर वह कागज
खोलने का साहस मुझमें नहीं है.
जब मैं घर के बाहर होता था तो मैं सिर्फ इसलिए जल्दी घर जाता था कि तुम घर में मेरा इंतजार कर रही होती थी. तुम
पड़ोसियों को परेशान कर करके बार बार फोन लगवाया करती थी, तुम्हारे चक्कर में सबके पास मेरा नंबर चला गया, तुम कहलवाती थी
कि बेटा जल्दी आजा, उस फोन का इंतजार अब तक
मैं कर रहा हूं, की तुम
फोन लगा कर बोले आजा बेटा तेरी याद आ रही है पर मैं जानता हूं यह अब नहीं हो पाएगा. मेरी
रातों की नींद ना जाने कहां खो गई है, कोई है ही नहीं बोलने को कि जो टोके की
बेटा तुझे नींद नहीं आ रही है क्या? मैं टाइम से खाना भी नहीं खाता हूं कोई है ही नहीं बोलने को बेटा खा ले ? सुबह उठकर बिस्तर सही करना घर से निकलते समय भगवान की पूजा करना सब अब दूर हो गया है या तभी मेरे पास था जब तुम मेरे पास थी।
बार बार तुम्हारा जिक्र लोगों से करता हूं आए दिन तुम्हारे किस्से याद करके हंसता रहता हूं पर अब मैं सिर्फ तुम्हारी बातें ही कर सकता हूं ना तो मैं तुम्हे देख सकता हूं न तो मैं तुम्हे सुन सकता हूं अभी यह मैं जब बोल कर लिख रहा हूं ना तब तुम्हारा चेहरा मेरी आंखों के सामने से गुजर रहा है। अभी 26 जनवरी गुजरी थी तब मैं लेट कार्यक्रम में गया था तब तक वहा झंडा वंदन हो चुका था मुझे को देखकर तुम्हारी याद आ रही थी कि वही
तिरंगे के सामने सलामी मंच के नजदीक तुम बैठी होती और जबरदस्ती राष्ट्रगान में खड़े होने की जिद करती पर अब यह सब यादें हैं जो सिर्फ मेरे पास है। मैं खुश हुआ उस दिन लेट कार्यक्रम में जाकर
अगर जल्दी जाता तो राष्ट्रगान के समय शायद आंसू निकल जाते
या खुद ही वह अजीब सी फीलिंग को महसूस करता जिसे मैं महसूस नहीं करना चाहता हूं अगर महसूस भी करना चाहता हूं तो मैं नहीं चाहता हूं कि लोग उसे देखकर मुझे कुछ कहे या कुछ पूछे.
मैं नहीं किसी को जवाब देना चाहता मैं खुद मैं खुश हूं या बहुत खुश हूं. 94 साल की उम्र काफी होती है जीने के लिए, इतना ज्यादा कौन जीता है पर मेरे हिस्से में तुम्हारी जिंदगी के सिर्फ
20 साल आए है पर क्या करें? अभी पिछले दिनों अकबर किताब पढ़ रहा था उसमें कुंभनदास का जिक्र है लगा कि यह तो वही को है जिनके बारे में अम्मा मुझे बचपन में बताया करती थी भक्तन को कहां सीकरी काम आवत जात पनिया टूटी बिछड़ गयो हरिनाम. फिर सोचा यह तो मेरे साथ भी हो रहा है बहुत सी बातें रात दिन दिल ना जाने क्या-क्या सिर्फ तुम्हें सिर्फ तुम्हें तुम्हें याद करता है। रह रह कर तुम्हारी बातें याद आती हैं अभी रात के 10:30 बज रहे थे मैंने केले खरीदे,
वहां एक अम्मा
खड़ी थी उन्हें मैंने राम राम बोला तो रह रहकर उनकी दबी सी आवाज में राम राम बेटा जब मैने सुना, याद आया की अम्मा तुम बताया करती थी कि तुम्हारी नानी आखिरी समय में डॉक्टर को राम-राम के कह कर मरी थी। शायद जैसे तुम अपनी दादी नानी मां पिताजी सब के बारे में बताया करती थी मैं भी सबको तुम्हारे बारे में बताया करूंगा किस प्रकार वैष्णो देवी में अम्मा 92 साल की उम्र में पैदल गई थी, कैसे वैष्णो देवी के मंदिर के अंदर जब तुम्हारे पांव में निकले छाले में से खून निकल रहा था तो मैने
अपशिष्ट पदार्थ के रूप में पड़ी प्लास्टिक की पन्नी को तुम्हारे पांव में बांधा था मेरे
आंसू निकल रहे थे. वह आंसू जो कृष्ण को सुदामा की बिबाई देखकर आये थे।
मुझे याद है की आखिरी बार तुम्हारे साथ जब राजभवन गया था तब तुम्हारी लाठी वही
अंदर रह गई थी, मैं भूल गया था क्योंकि व्हीलचेयर से तुम बाहर आ रही थी फिर वह एसडीएम मैडम
लाठी लेकर बाहर आ आई और बोली क्या हुआ लाठी भूल गए थे तुम, शायद तुम्हारी लाठी बता रही थी कि अब छोड़ दे मुझे, यही आखिरी घर से बाहर तुमहरी यात्रा थी,
मैं जब भी वीआईपी रोड के नजदीक से निकलता हूं मुझे याद आता है कि अम्मा के साथ बचपन में यहां से पैदल घूमता था ऐसी एक भी जगह नहीं छोड़ी अम्मा तुमने जहां पर तुम्हारी याद ना आए, यही कारण है कि भोपाल में मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं वहां किसी को ढूंढता हूं जो इस दुनिया में ही नहीं है। घर की हर चीज तुम्हारे हाथ से आई है, वह बिस्तर, वह पलंग, वह कूलर, वह पंखा सब कुछ।
जब तुम मटके में से ज्यादा पानी नीचे से निकलने पर उसने सीमेंट लगा देती थी खुद ही किचन और बाथरूम में सफेदी पोत दिया
करती थी, वो तीन मंजिल पर तुम्हारे साथ सीढ़ियां चढ़ना, जब मैं तुम्हें गोदी में उठा कर ऊपर ले जाता था तो तुम बोलती थी कि नहीं बेटा गिर जाएगा, जब आंख बंद करो तो तुम और
तुम्हारी सीखे सामने होती है,
तुम्हारी बातें याद आती है, जब किसी को किसी से ₹10 मांगते हुए देखता हूं तो लगता है उसे बताऊं कि मेहनत करना ज्यादा कामगर है, तुमने मुझे आत्मनिर्भर बनाया है बहुत कुछ है बोलने को पर किसे जाकर बोलू
बहुत सारा गुस्सा है जो अंदर ही अंदर भरा हुआ है पर जिसे में चाह कर भी निकालना नहीं चाहता। मेरे हिसाब से मैं बहुत खुश नसीब हूं कि जितना भी हो तुम्हारा साथ मेरे साथ था। तुम्हारे सुख दुख ढलती उम्र में मैं तुम्हारे पास था कभी कबार मन करता है कि मैं बाथरूम में नहाने जाऊं और मेरी अम्मा वहां कुर्सी पर बैठी हुई मिले और कहे बेटा नहला दे।
पर यह उस कवि की कल्पना जैसी ही बात है जो एक नदी को औरत की तरह देखता है. मेरा मन करता है तुम्हे बतायू कि तुम्हारी बात गलत साबित हुई ।
जब तुम गोवर्धन से आई थी तब तुमने आकर बोला था बेटा ज्योतिषी ने बताया है कि मेरी मौत गोवर्धन में होगी, पर
तुम्हारी मिट्टी
भोपाल की मिट्टी में ही मिली है, ब्रज की रज मैं भक्ति और प्रेम है पर तुम्हारा अख्खड़ पन उसमें कहां मिलता, तुम किसी की कभी मानती नहीं थी
हां तुम सोचती सबके लिए बहुत अच्छा थी शायद घर के बुजुर्ग ऐसे ही होते है, जो हर किसी की चिंता , हर किसी के लिए प्यार , हर किसी के लिए मुस्कान लिए होते है, लिखने को बोलने को समझने को बहुत कुछ है, कटरा स्टेशन पर एक्सीलेटर में ना चढ़कर तुम 50 सीढ़ियां चढ़ी थी काश फिर से वह मौका मिले, कभी कबार लगता है मैंने 22 साल के जीवन में 94 साल की जिंदगी भी देख ली, क्योंकि तुम मेरे पास थी वह तुम्हारा जिद करना कि बेटा मोदी को सुनना है जब लाल परेड ग्राउंड जाकर तुम्हारा सो जाना किसी बचपन वाली जिंदगी है, जो तुमने जी है। मिट्टी की पकड़ आसमान की चाहत और सब का भला शायद यही जिंदगी है। जैसा सोचो वैसी तो नहीं है यह दुनिया, यह रस्मों रिवाजों की दुनिया।
काश मैं यह सब तुम्हें बोल पाता तुम पक्का मुझे सीने से लगाकर खूब सारा प्यार करती, फिर कहती
बेटा
चाय बना ले, पर मैं यह सब तुमसे कह नहीं सकता और कहूंगा भी तो तुम सुन नहीं सकती
और अगर सुनती भी होगी तो तुम्हें मै तुम्हारा चेहरा कैसे देखूं? मुझे यकीन है कि मेरे कहे बिना तुम्हे
यह सब मालूम था| लव यू अम्मा
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