नाटक शहादत
ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
मैं जहां रहूं जहां में याद रहे तू
तू ही मेरी मंजिल, पहचान तुझी से
तू ही मेरी मंजिल, पहचान तुझी से
पात्र -3
1, भारत माता - भारत देश की अधिष्ठात्री देवी
2, महात्मा गांधी- मोहनदास करमचंद गांधी, बापू
3, भगत सिंह - शहीद आजम भगत सिंह
दृश्य - 1
स्थान - अमृतसर जलियांवाला बाग मई 1919

जलियांवाला बाग अमृतसर में 40 साल का एक आदमी फकीरों जैसा लिबास पहन कर धीरे धीरे बाग में चक्कर लगाते हुए रो रहा है, उसके आस पास कांग्रेस के स्थानीय नेता उसे मिस्टर गांधी कह कर उसे पुकार रहे है, वहां बाग में चारों तरफ खून के छींटे पड़े हुए है,बापू गांधी को सरदार (सिंख) वहां कुआं दिखाते हुए कहते है, कि जनरल डायर की गोलियों से बचने के लिए यहां कई महिलाएं और बच्चे वैसाखी के उस दिन अपनी जान गंवा बैठे, जैसे ही गांधी उस कुएं में झांकते है, तो उन्हे कुएं में कुदती, चिल्लाती महिलाएं दिखती है, वह कांप कर पीछे हो जाते है और अपने साथ आए लोगों को उन्हे अकेला छोड़कर जाने को कहते है, बापु अकेले घुम रहे है तभी एक 20- 22 वर्षीय युवती को अकेली बैठे देखेते है वह सफेद साड़ी पहनी हुई है, जिसमें कई छेद है, काली, लाल मिट्टी से रंगी हुई उसकी साड़ी उसकी गरीबी को साफ झलकाती है, इतने में उनकी नजर उसके पांवों में बंधी हुई बेड़ियों पर जाती है, वह इतना तेज चिल्ला चिल्ला कर रूदन कर रही है, कि मानो कोई युवती अपने प्रिय परिजन के मरने पर जैसा रोती हो, गांधी समझ जाते है, कि यह युवती अपने किसी परिजन के खोने के गम में रो रही है, गांधी उसके पास जाते है और उससे पूछते है बहन तुम कौन हो ? और क्यों रो रही हो? वो और तेज रोने लगते है उसके पांव की बेड़ियों को देखते है, तो उनके पांव के घाव पक चूके थे, जिसमें से पिंब निकल रहा था, गांधी उससे कुछ पूछने कि हिम्मत ही नहीं जुटा पाते है, तभी एक बारह वर्ष का बच्चा वहां पहुंचता है और उस महिला की बेड़ियां तोडने की कोशिश करता है, वह नजदीक से एक छोटा सा पत्थर उठाकर लाया है और उस स्त्री की जंजीरो पर मारता है, गांधी तवाक से बोलते है बेटी तुम्हारा यह हाल किसने किया, क्या तुम्हारे कोई अपना यहां की मिट्टी में मिला है, वो युवती बोल उठी अपने मेरे तो सारे अपने थे जिनकी चीखे, जिनका खून, जिनकी लाशे आज भी मेरी छाती के ऊपर पड़ी हुई है, मेरे बच्चे जो मेरी बेड़ियों को तोड़ने यहां इक्ट्ठा हुए थे उन्हे यहां गोलियों से भून दिया गया, गांधी 2 मिनट वहां स्थिर हो गए फिर वहां सर झुकाकर बोले भारत माता आप, मैं आपको पहचान भी नहीं पाया मां हम सब भारतीय मिलकर आपको इन बेड़ियों से आजाद करवायेगे, मां आप से एक अर्जी है,कि जब भी मैं आपकी आजादी के लड़ाई के दौरान अपनी जान गवांउ आप उस समय वहां मौजूद रहोगी, भारत माता बोली हां मेरे बेटे, तब तक वह 12 साल का बच्चा उन दोनों को बोलते हुए सुनकर बोलता है, मां मैं भी जब शहीद होगा, तब आप मेरे आखरी समय में मुझे भी अपना चेहरा दिखाना मैं समझ जाउंगा कि मेरी आहुति आपने स्वीकार कर ली, भारत माता हंस कर बोली हां बेटा.

1905 में अबनिंद्रनाथ टेगौर द्वारा बनाया गया भारत माता का पहला चित्र
(पर्दा गिरता है)
दृश्य 2
लाहौर जेल 23 मार्च 1931
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजू ए क़ातिल में है
यह पंक्तियां बज उठती है क्रांतिकारी युवा भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव हंसते हुए चलते जाते है आज उन्हें फांसी कि सजा मिलने वाली है पर वह चलते चलते अपने बैरक से बाहर निकलते है, तभी इंकलाब जिंदाबाद के नारों की आवाजे जेल में बंद कैदी निकालते है, भगत सिंह वही जलियांवाला बाग वाला 12 साल का बच्चा था, जो अब 23 साल का होकर भारत माता को देखने वाला था, भगत सिंह जैसे ही फांसी के फंदे के पास पहुंचता है भारत माता वहां आ जाती है, भगत एकटक माता को देखता है और जोर जोर से हंसता है, उसे बचपन की अपनी सौगंध पूरी होने पर गर्व है वह फंदे को चूमता है, तभी मां धीरे धीरे आगे आती जाती है जैसे ही फांसी लगने के बाद भगत सिंह शहीद होते हैं माता उन्हे अपनी गोदी में उनका माथा रखकर भगत को कहती है, तु मेरा शहीद ए आजम है|
दृश्य 3
बिड़ला हाउस दिल्ली 30 जनवरी 1948
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान
रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम

महात्मा गांधी बंगाल में साम्प्रदायिक दंगों के विरोध में अपने सत्याग्रह से काफी कमजोर हो गए थे, देश आजाद हो गया था, पर बापु अंदर ही अंदर अपनी उस सोगंध को याद कर रहे थे जो उन्होंने जलियांवाला बाग में ली थी, उन्हे रात में उसी दिन का वाक्या सपने में आता है उन्हे बेड़ियों में बंधी भारत माता दिखती है, छोटा बालक भगत दिखता है पर उन्हे भारत माता का चेहरा साफ नजर नहीं आता है, उन्हे अब माता के दिखने की उम्मीद नहीं दिखती है पर 30 जनवरी को वह प्रार्थना सभा में जाने के लिए निकलते है उनकी दो सहयोगी उनकी सहायक बनकर चलती दिखती है, तभी बापू को भीड़ से चलकर आती भारत माता दिखती है, माता की मुस्कान देख बाबु एकदम तेज गति में चलने लगते है, उनकी सहयोगी मनुबेन ड़र जाती है, कि बापू को आज क्या हो गया है, बापू उनके सामने कभी इतना तेज नहीं चले थे, उन्होने गांधी को अक्सर डगमगाते कदमों से ही देखा था, वैसे तो बापू की डांडी यात्रा के किस्से उन्होंने खूब सुन रखे थे पर वह किंवदंतियों जैसे ही नजर आते थे, पर गांधी शायद महात्मा की आत्मा आज अपनी आत्मा के खात्मे और उनके अस्थि पंजर के भारत माता में समाहित होने की नियति को भांप चूके थे, तभी बापु को गोली लगती है वो हे राम बोलते हैं|
वॉइस ओवर
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन परस्ती पर मरने वालों का यही बाकि निशान होगा
लेखन शुुुभम शर्मा
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