समाप्त अध्याय

कहते है इंसान एक बार ही जन्म लेता है और एक बार ही मरता है, पर जिंदगी में  कई लम्हे ऐसे आते है जो मौत के समान्तर नहीं तो मौत से कम भी नहीं होते है. बस वो दृश्य हमारे जीते जी हमारे सामने घटते है, कलेजा मुंह तक आ जाता है, रोम रोम आंतरिक पीड़ा को अनुभव करता है, जोर से चिल्लाने का  या रो रो कर बिलखने  का  जी करता है, पर उस परिस्थिती में  आंसू भी सूख जाते है, उन आंसू ओं को भी यह ज्ञान होता है, कि रोए तो किसके लिए? जो इन आंखों से निकलने वाले जल को देखकर बिलख  उठता या अपनी साड़ी के पल्लू  से आंसूओं  को पोछता  वो अब इस दुनिया में ही नहीं. इन अश्रु धारा को नयन चक्षु से बाहर निकलने के लिए किसी घटना विशेष का  इंतजार करना पड़ता है, कोई किस्सा, स्मृति या व्यक्ति उस आंसू की  जड़ हो सकती है. वह मौत जिस जीवित मृत्यु की  संज्ञा मैने दी है, वह किसी अपने की  लाश सामने देखकर आती है. यू तो हर परिपक्व इंसान को मालूम है, कि मौत अटल सत्य है, हर घड़ी, पहर और समय यह आपको घेर सकती है, पर इस सच को जानने और मानने के अंतर की खाई समझना कठिन है. मैं अपनी दादी की मौत के सदमें को कभी भूल नहीं पाया, उनके जाने के बाद उनकी स्मृतियां और भी उभरने लगी. और यह दर्द विकट होता गया. कल ही वह सपने में  दिखी, कि मैं उन्हे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में ले गया और खाने का  कोर अपने हाथों से खिला रहा था, न जाने इस आभासी सपने में कितनी ताकत थी, कि मैं घंटो रूधासा  रहा, अचैन्तय मन सपने में खुश था, पर होश में आते ही गम बढ़ता गया. मन ही मन बहुत सी बाते समायी  है, जो बताने में  फरेबी दुनिया के सामने ड़र  लगता हैं. जब दादी की  मौत हुई, 10 अक्टूबर 2017 मंगलवार का  दिन था और सुबह के छह बजे के आसपास का  समय था, एकाएक फोन की घंटी बजी  फोन के दूसरे तरफ मम्मी थी, उन्होने हैलों  बोला, और लगभग रोते हुए बोला "बेटा अम्मा की  तबियत बहुत खराब हो गई है, दो चादर उनके कपड़े लेकर जल्दी आजा", उनकी दर्द भरी आवाज में उनकी अनकही बात भी मेरे  मन ने सुन ली थी, कि अब अम्मा नहीं रही इक्तालीस दिन की  एल बी एस हॉस्पिटल की उनकी यात्रा का  यह दुखद अंत था. सृष्टि के हर तत्व का  अंत दुखद ही है. वैसे एक दिन पूर्व उनकी देखभाल कर रहे डॉक्टर ने मुझे बताया था, कि भैया अब हम उनके शरीर में  छेद नहीं कर सकते, उनकी पल्स बहुत कम बची है, जब तक उनकी सांसे है, तब तक वो है. डॉक्टर की  यह बात सुनकर ही मुझे उनके जाने का  आभास हो गया था, वैसे अम्मा जब बिस्तर पर अपनी अंतिम सांसे  गिन रही थी, तब उन्होने दो दिन से आंखे नहीं खोली थी, जब उनके सुजे  हुए पांव की मालिश की  तब जाकर उन्होने दो सेकेण्ड के लिए आंखे खोली और उतनी ही शीघ्रता से बंद भी कर ली उन्होने आखरी बार मुझे तब ही देखा था, बहुत अम्मा अम्मा बोला, उनके गाल पर हाथ फेरा, उनके माथे को सहलाया, उनके चांदी जैसे बालों पर हाथ फेरा पर वो नहीं उठी. जब भी अम्मा की  तस्वीर, उनके कपड़े या राष्ट्रगान की  धुन सुनता हुं ऐसा लगता है या तो वो मेरे बगल में  है या मेरे आसपास दरअसल अपनी आयु के अंतिम पड़ाव पर भी राष्ट्रगान के बजने पर वह खड़े होने कि प्रयास करने लगती थी, उन्हे समझाना पड़ता था, अम्मा नहीं खड़े हो पा रहे हो तो कोई जरूरत नहीं है खुद को पीड़ा देकर उठने की  फिर वह एकाएक बैठे बैठे अपने कांपते हाथों और अपनी लाठी को कसके  कुर्सी से सटाकर जन गण मन गुनगुनाती  थी, वह राष्ट्रगान की  लाइने लगभग भूल चूकी  थी, पर एक स्वतंत्रता सेनानी का  होसला  जिसने देखा होगा वही समझ सकता है, कि वह कितने रोमते  खड़े करने वाले देशभक्ति से ओतप्रोत क्षण होते है. वैसे जब डॉक्टर ने उनकी दुनिया से रवानगी की  घोषणा कर दी, तब मम्मी को नजदीकी शाहजहाँनाबाद ले जाकर दूध पिलवाया  और अंतिम  संस्कार संबंधी रिवाजों या घर से जुड़ी बातों को पूछकर  घर गया, मैने चालीस दिन एक परंपरा का  निर्वहन किया था, कि दादी की  प्रसंदीता  साड़ी को सिराहने  रखकर सोना प्रारंभ किया था. जो बच्चा बचपन से उस बूढ़ी मां के साथ सोया हो वह कोई सहारा ढुढ़ेगा ही क्योकि उस रात मोह विरक्ति के लिए साड़ी को सिराहने  से हटाया इसीलिए रात भर नींद ही नहीं आई, शोक भवन में वियोग का  प्रभाव उसी रात हो रहा था, जब उनकी तबियत बिगड़ने का समाचार सुना तो आंखों में  आंसू थे और होठ कांपते  हुए अम्मा अम्मा चिल्ला रहे थे पर स्वर इतना धीमा था कि मुझे भी सुनाई नहीं दे रहा था. घर से शीतल दास की  बगिया  तक रोते बिलखते  गाड़ी चलाई, फिर स्मरण आया पिंकू  टूटना नहीं है और "मौत अंत है नहीं तो मौत से भी क्यो ड़रे यह जाके आसमान में  दहाड़ दो " यह लाइन गाते हुए उन अश्रुधाराओं को अंदर मन के कपाट में बंद कर दिया. अस्पताल के भीतर सतह में  आईसीयू के नजदीक मम्मी खड़ी दिखी उनसे पूछा अम्मा?? उन्होने रो दिया. उनके रोने में  शब्द नहीं थे पर एक जीवन यात्रा के अंत की पूष्टि थी. तब ही अचानक स्टेचर  पर लेटी हुई अम्मा दूर से आती दिखी , मुझे उनके चमकते हुए चांदी के बाल दिख रहे थे, मुझे लगा मानों संजीवनी बूटी मिल गई हो मैं अवाक खड़ा रहा वो स्टेचर नजदीक आया और मैने देखा कि वो अम्मा नहीं कोई और बुर्जग महिला थी, दरअसल वह उस डॉक्टर कि ही दादी थी जिसने मुझे कल दादी के विषय में बताया था, उसकी दादी भी उसी अस्पताल में भर्ती थी. फिर दर्द दोगुना हो गया , सिस्टर ने बोला आपको सर बुला रहे है डॉक्टर अम्मा जहां लेटी थी, उसके सामने ही बैठे थे. उन्होने कहां दादी अपनी आखरी लड़ाई बहुत जुझारूपन से लड़ी पर सुबह छह बजे वो सो गई. मैं रोजाना डॉक्टर से जिरह  करता था, पर उस दिन मेरे पास शब्द नहीं थे, न आंसू थे, उसने मुझे सामने दादी के पास जाने को कहां दादी जो मुझे देखकर खिल उठती थी, वह सफेद चादर में सुन्न पड़ी थी. इतना सन्नाटा मैने कभी अनुभव नहीं किया था. न इतना शांत मैं हुआ था, मेरी हिम्मत नहीं थी, कि मैं अम्मा के मुंह से चादर हटाकर उनका चेहरा देख सकूं. नर्स उनके पांव में  बंधा प्लास्टर कांट रही थी और मेरी हर इक श्वास मानों जा सी रही थी. अभी उन्हे गए एक घंटा भी नहीं हुआ था, कि मैं टूट गया था, मैने उन्हे बहुत बार गोदी में उठाया था, हमेशा मेरे कंधे पर बैठकर ही वो बाहर जाती थी. अस्पताल भी मैं ही उन्हे गजेंद्र  और नरेश के साथ गोदी में उठाकर लाया था. पर अस्पताल से घर तक का  सफर असहनीय था. उनकी अचेतन शरीर मेरे को अतीत में ले जा रहा था, वो पहली मर्तबा एंबूलेंस में बैठकर राजा भोज सेतु के ऊपर से निकली थी, उनको मैने बोला था कि अम्मा सही हो जा ओं यही खड़े हो कर अपन तालाब को देखेगे. बहुत से सपने जगी हुई आंखों से उनके साथ देखे थे, पर सब अंधूरे रह गए. शायद इसीलिए जिंदा आदमी अपने परिजन की  मौत में  खुद के एक अध्याय को समाप्त पाता है.
(दादी मंगो  देवी शर्मा को समर्पित)

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