वैराग्य की नदी
गुजरात में बड़ोदरा के पास नारेश्वर धाम नामक स्थल है, जो माँ नर्मदा के तट पर है, यहां दत्ता पंथ के रंग अवधूत महाराज का आश्रम है, यहां पर एक कुत्ते की समाधि है, कुत्ता महाराज जी के समय साधु महात्माओं की तरह रहा करता था, तो उनकी मौत के बाद उनकी समाधि वहां बनाई गई, माँ नर्मदा की परिक्रमा ऐसे अनेको आश्चर्यजनक स्मरण समाये हुई है, अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने माँ नर्मदा की परिक्रमा की तो मुझे बहुत से लोगो से सुनने में आया की क्या नर्मदा की परिक्रमा भी लगती है? सुनने में अचरज हुआ कि वो माँ की ममता से कितने वंचित रह गए है, नर्मदा को उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नदी माना जाता है, माँ नर्मदा शिव की श्रम(पसीने) की बूंदों से अवतरित हुई थी, हमारे यहाँ नदियों के उत्तर घाट को ही पवित्र माना जाता है, दक्षिण घाट को नहीं, माँ गंगा के दक्षिण घाट पर भी पूजा की पाबंदी है, पर नर्मदा के दोनों घाटों पर पूजा होती है, खंडवा क़े दादा धूनीवाले की परंपरा में केवलानन्द जी महाराज हुए है वह नर्मदा को साधुओं के तप का नतीजा मानते थे.
परिक्रमा की शुरूआत
दादा धूनीवाले के गुरु गौरीशंकर जी महाराज ने ही नर्मदा परिक्रमा की शुरूआत की थी, ऐसी मान्यता है कि वह जब नर्मदा परिकर्मा पर निकलते थे तो रास्ते में उनके साथ रहने वाले जत्थे को यदि भूख लगती थी तो वह माँ का स्मरण कर नदी में बर्तन डालते थे और नदी का जल खाद्य सामग्री में तब्दील हो जाता था. नर्मदा को वैराग्य का पर्याय माना गया है. नर्मदा के दर्शन भर को पापनाशक माना गया है, ऐसी भी मान्यता है कि कुछ सम्प्रदाय के साधु नर्मदा जल में स्नान नही करते है, क्योकि नर्मदा कुँआरी है. माँ की परिक्रमा में वैराग्य के विषय में एक कहानी मेने सुनी हुई थी, जिसकी वास्तविकता की जांच करने पर वो सच पाई गई, की गुजरात और मध्यप्रदेश की सीमा में भील जनजाति रहा करती है, प्रत्येक परिक्रमा वासी का नियम होता है, कि वह परिक्रमा की 3 साल की अवधि ( दिग्विजय सिंह ने 6 महीने में पूरी की है) में नर्मदा जल का ही पान करेगा और हर हर नर्मदे के उदघोष का प्रतिउत्तर अवश्य देगा, परिक्रमावासी की पहचान इस धार्मिक नारे से भी लगाई जा सकती है, भील जनजाति के लोग परिक्रमा की मूल अवधारणा (वैराग्य) को पूरा करने के लिये अपने इलाके से निकल रहे लोगो से नर्मदे हर का अभिवादन करते है यदि उन्हें समान उतर मिल जाता है तो वह उस व्यक्ति के पास मौजूद कोई कीमती वस्तु को नदी में प्रवाहित कर देते है , यह वैराग्य की यात्रा में सहायक बनने की उनकी कोशिश है, जब इस विषय मे होशंगाबाद की मूल निवासी अपने एक दोस्त से मैने पड़ताल की तो उसने पता लगाया कि यह काम भील जनजाति करती है पर वह अब प्रवाहित नही करती बल्कि उसको खुद उपयोग में लाने लगी है ठीक वैसे ही अब वैराग्य के मायने भी बदल गए है, नर्मदा के तथाकथित उपासक अब राज्य मंत्री है, माँ नर्मदा के जल को हाथ में लेकर आजीवन अविवाहित रहने की झूठी कसम खाने वाला व्यक्ति मुख्यमंत्री है. साधू सन्यासी सही कहते है ऋषियों के तप से आज भी रेवा कल्पों से बह रही है और न जाने कितने शंकराचार्य, गौरीशंकर ओर दादी धूनीवाले सहित अवधूतों पर वैराग्य का शांत रस बरसा रही हैं.
हर हर नर्मदे
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