एक ही युक्ति मोक्ष नहीं मुक्ति
भारत में पूंजी से ज्यादा आवाम मुक्ति की राह तलाशती है , वह मुक्ति की चाह जो हमे जन्म- जन्म के चक्कर से छुटकारा दिला सके. इसके लिए पूजा पाठ , जप तप, ध्यान, योग, माला रटने से लेकर न जाने क्या क्या उपक्रम हम लोग करते है. भारत में जन्म की भी एक श्रखंला है , जिसमे इस जन्म में किये हुए अच्छे बुरे कार्यो को हमे दूसरे जन्म में पाप पुण्य के रूप में भोगना होगा . यही सोच हमको नीरस बनाई हुई है . जहां हम जोह लक्ष्य साध्य नही पाए है , उसे अगले जन्म में पाने का सपना देखते है. दिन में खुली नींद से देखे गए इस सपने के सच होने की कोई संभावनाए नहीं है , क्योकि किसी ने अपना अगला जन्म देखा नही है , क्योकि यह भी एक विशेष बात है , जोह हमे बचपन से सिखायी गयी है कि 84 हजार योनियों के एक चक्र को पूरा करने के बाद यह मानव का शरीर हमे मिला है. यानी दुबारा अपने अधूरे सपने को पूरा करने में हमे अन्य शरीरो के कालचक्र से गुजरना होगा . यानी भारतीय दर्शन यह कहता है कि हमे अगले जन्म में किसी कीड़े या जानवर के शरीर में ही कैद होना है.
भरत के तीन जन्म
भरत नाम के एक ऋषि ध्यानमग्न थे वह मोहविरक्त होकर संयास को प्राप्त हुए थे. इस दौरान उन्होंने अपने सगे संबंधियों का परित्याग कर दिया था , पर नियति से अच्छा कोई विषयवस्तु का लेखन नही कर सकता. एक दिन भरत मुनि ध्यान में थे और तभी हिरणों के एक समुह के पीछे एक शेर शिकार की तलाश में आया. उस समूह में एक गर्भवती हिरण ओट के पीछे छुप गयी . तभी शेर ने गर्जना की ओर मादा हिरण ने प्राण त्याग दिये, उसके भूर्ण ने तब तक जन्म ले लिया था . भरत मुनि वहा तपस्या कर रहे थे और परिस्थितियों में उन्होंने उस हिरण को पाला पोसा. जिससे उन्हें उससे मोह हो गया. एक दिन हिरणो का समहू उस वन में आया और वह युवा हिरण उनके पीछे पीछे चला गया. भरत मुनि को यह सदमा बर्दास्त नही हुआ और उसके गम में उन्होंने प्राण त्याग दिए . अगले जन्म में वह हिरण के रूप में दोबारा जन्म लिए. उन्हें अपने पिछले जन्म के विषय में सब ज्ञात था कि किस प्रकार उन्हें एक हिरण के मोह में मुक्ति नही मिली . उन्होंने इस शरीर में भी अपनी चेतना को जागृत रखा वह ध्यानमुद्रा में खुद को जानने में सक्रिय रहते थे , उनका यह जीवन समाप्त होते ही पुनः उनका मानव वेष में जन्म हुआ उन्होंने सन्यास लिया और ध्यान और स्वजागरण के बलबूते वह मुक्ति को प्राप्त हुए.
मोक्ष नही मुक्ति
मुक्ति वह युक्ति है जोह आत्म को परमात्मा से मिलाती है, मोक्ष ओर मुक्ति में एक बारीख सी सीमा है. मोक्ष में हमे स्वर्ग मिलता है जहाँ हमारे पाँव में विलासिता की जंजीरे होती है. वहां हम सोने की बेड़ियों में जकड़े होते है जोह की मोह रूपी मानव शरीर से भी ज्यादा मुश्किल देने वाली है. क्योकि स्वर्ग के राजा इंद्र भी सत्ता बनाये रखने के लिए मृत्यु लोक के मानवो से भी भयभीत रहते है . फिर उसके लोक में रहने वाले मोक्ष प्राप्त निर्वासित जीव कैसे संतुष्टि को प्राप्त होंगे इसीलिये मुक्ति ही वह उपाय है जहा आपका अस्तित्व ही निराधार रह जाता है . आप उस शून्य में समा जाते हो. जोह वैसे तोह व्यर्थ है पर वास्तव में परमसत्य उसी में समाया है|
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