गांधी बापु अहिंसा के पुजारी
वर्धा आश्रम में गांधी जी की प्रार्थना सभा चल रही थी, नियमित दिनचर्या के अनुसार गांधीजी मंच पर प्रार्थना का हिस्सा थे और आंगुतक आलती पालती मार के सामने बैठकर ध्यानस्थ थे. गांधीजी नीचे उतरकर जाने लगे और उपवन में भ्रमण करने लगे इतने में एक पत्रकार उनसे सवाल जबाव करने या साक्षात्कार की चेष्ठा करने लगा. बापु ने उसकों दो शब्दों में उसे मनाही की. उनके स्वर तेज आवाज में निकले थे , इसीलिए बापु ने इसे शाब्दिक हिंसा मानकर पुरे दिन अन्न का त्याग कर उपवास किया. गांधीजी का आचरण ही ऐसा था कि वह अपने तेज स्वर को भी हिंसा की संज्ञा देते थे. प्रस्तुत वाकया एक प्रत्यक्षदर्शी छात्र ने अपनी आत्मकथा में दर्ज कराया है, जो कि आगे चलकर पुलिस के शीर्षस्थ पदों पर काबिज हुये. आज बापु की पुण्यतिथी है. यह भी संयोग है कि अहिंसा को आचरण में ढ़ालने वाले ऐसे महापुरूष हिंसा की भेट चढ़कर चिंर समाधि में लीन हुये. पर गांधीजी का शरीर ही हमारे मध्य नहीं है पर उनकी आत्मा उनके विचार हमारे मध्य स्थायी है.
एक वाकया गौतमबुद्ध के साथ भी घटा वह एक गांव में विचरण करते हुये पहुंचे थे. वहां नजदीक ही एक पर्वत के मध्य सुरंगनमा रास्ते में एक नरभक्षक लोगों की जान लेने के लिए कुख्यात था. गांववासियों ने उन्हे बताया कि उस नर रूपी पिशाच ने बहुत से लोगों को मौत की अवस्था में पहुंचा दिया है वह मानसिक रूप से विकृत हो चुका है. इस कारण हमने वहां से निकलना बंद कर दिया है. छहमाह से उस रास्ते से कोई निकला नहीं है. बौद्ध ने यह सुना और वह उस रास्ते से निकलने के लिए प्रतिबद्ध हुये वह सुरंग के समीप पहुंचे तो उस नरभक्षक ने उन्हे देखा, और अपने स्थान पर खड़ा होकर हिंसा की मुद्रा में आ गया.
जिस प्रकार आखेट के समय शिकारी शिकार को सावधानी से निहारता है. एक संन्यासी को आगे आते देखकर उस नरभक्षक के मन से स्वर फूट पड़ा तु यहां क्यो आ रहा है? तुझे पता नहीं मैं यहां से निकलने वाले को जिंदा नहीं छोड़ता, जा , जा यहां से भाग जा... बुद्ध चलते रहे . फिर वह बोला तु पागल नजर आता है इसीलिए मेरी बात सुनकर भी आगे आ रहा है यह देख मेरा हथियार (उसने अपनी औजार उठाकर बुद्ध को दिखाया) मारा जायेगा , भाग जा बुद्ध उसके समीप जा पहुंचे तब तक उस नरभक्षक की हिंसा करूणा में तब्दील हो गयी और वह बुद्ध के आगे नतमस्तक हो गया.
अहिंसा वह पूंजी है , वह तेज है जिसके आगे हिंसा की तलवार ठेर हो जाती है. भगवान बुद्ध और गांधीजी का संदर्भ एक साथ देने की वजह यह है, क्योकि बापु भी हिंसा के ज्वार को समाप्त करने साम्प्रदायिक आग को बुझाने अपनी लाठी और अपने दो निर्मल पैर के यूं ही चले जाते थे. जिस प्रकार यशोधरा को सोता जान सिद्धार्थ ( बुद्ध) संन्यास को चले गये थे , उसी प्रकार कस्तुरबा गांधीजी को भी संदेह था कि बापु कही रात में कहीं निकल न पड़े इसीलिए वह रात्री में उठउठ कर बापु को बार बार देखती थी.
बापु को पुण्यतिथी पर नमन
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