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शिव समय के देवता

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पूर्णिमा पर चांद जब निकलता है, वह सोलह कलाओं से निपुण होता है, सुहागिन स्त्री भी सोलह श्रृंगार करती है, पर शिव अट्ठारह श्रृंगार करते हैं, शिव को अवधूत कहा जाता है, अवधूत यानि स्वयं शिव, जिसके श्मशान भूमि और राज भूमि एक सी हो, जो मल और मांस दोनों खा सकता हो. हमारे यहां संतो की सबसे बड़ी डिग्री अवधुत ही है, भगवान दत्तात्रेय भी अवधूत थे और रामकृष्ण परमहंस भी. अवधूत संयास की वह अवस्था है जहां मोक्ष पाने के लिए नहीं बल्कि मोक्ष दिलाने के लिए साधना की जाती है. शिव को लेकर एक बात कहीं जाती है कि वह संहार के देवता हैं, महाकाल के काल को मौत मान लिया जाता है जबकि वह समय के देवता हैं, उनको ढंग से देखिए समय यानि क्या? भूतकाल, वर्तमान और भविष्य. शिव की तीन आंखें हैं, उनके माथे पर त्रिपुण है, उनको बेलपत्र भी तीन पत्तियों वाली चढ़ाई जाती है. बीच का सिरा वर्तमान है और बाकि बाकि दो सिरे भविष्य और भूत है. वर्तमान का सिरा हमेशा स्थिर होता है, बिल्कुल सीध में जिसे एक मंत्र ओम् तत् सत् से जोड़ सकते हैं, जिससे आशय है कि हम आज में ही जी सकते हैं बाकि भविष्य और भूत के विषय में सोचकर हम निश्चित और आ...

दूरियां ज़रूरी हैं

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दूरियां ज़रूरी हैं इक दूजे को समझने के लिए. यह सलाखें, यह पाबंदियां उन जिंदगियों की असलियत है जो बंद है कारावास में वर्षों से. उनकी खुशियों का रास्ता है यह झरोखा, जो लाता है उन तक उनके अपनों की महक और फिर मिलने की आस.

गोरा रंग श्रेष्ठ कैसे

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राक्षसों के शरीर का का रंग काला है वही देवता श्वेत वर्ण के है, भगवान को भी हम गोरे काले रंग से तोलते है, सूर्य देवता को उनके पुत्र पसंद नहीं थे क्योंकि शनि देव अश्वेत थे. जब बचपन से हमें साहित्य में बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला जैसी कहावतें सिखाई जाती है तो यकीनन हम काले रंग को नीच और बुराई का प्रतीक मानने लग जाते है, हमारे समाज में गोरे रंग की एक सत्ता है, जो जन्म से ही श्रेष्ठ घोषित हो जाती है, सड़कों पर हमें दुपट्टा बांधे महिलाएं दिख जाती है, विकास की दौड़ में कहर बरपाती धूप से बचती इन महिलाओं को धूप से नहीं काले होने से डर लगता है, यदि गोरे रंग की मालकियत समाप्त हो गई तो ब्यूटी प्रोडक्ट के कई धंधे बंद हो जाएंगे, किसी व्यक्ति के शरीर का रंग भद्दा कैसे हो सकता है? जबकि विश्व इतिहास में गांधी, नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक इस श्वेत सिंहासन को हिलाने में अपना समय देते है, फोटोशॉप के जरिए खुद को ब्यूटीफुल दिखाने के लिए खुद को गोरा करता समाज पिछड़ेपन में जीता है, यह पिछड़ापन उस गुलामी का ही रूपक है, जो गोरों की गुलामी करता है, हम भी बड़े अजीब है, हमे शरीर का रंग गोरा चा...

मुझे भीड़ पसंद नहीं है

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मुझे भीड़ पसंद नहीं है, न मुझे भीड़ में खड़ा होना भाता है न ही मुझे भीड़ को ताकना पसंद है फिर भी मेरा सच यही है कि मैं भीड़ में ही कहीं शामिल हूं. लोग अक्सर गांव से शहर की ओर जाते हैं, मैं शहर से गांव गया था, वो भी पत्रकारिता करने मैंने गांव को जितना भी जाना समझा है इस तमगे के साथ जाना है. पत्रकारिता करनी है, यह मैंने पांच साल पहले सोचा था. सोचते ही माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में एडमिशन ले लिया, वहां गया तो पत्रकार बनने था पर वहां नेता (छात्र नेता) ज्यादा समझा गया. इस नेता शब्द को मिटाने के लिए अखबार, चैनल के दफ्तर खंगालने लग गया, आखिरकार मुझे देर सवेर इस शब्द से अब छुट्टी मिल चुकी है. मैं किस्मत में बहुत मानता हूं, कई बार मेहनत से ज्यादा और कई बार उसके बराबर भी, मैंने किस्मत को कभी भी मेहनत से कम नहीं आंका है. ऐसा क्यों है? इसके पीछे अब तक की पूरी 23 साल की जिंदगी है. एक बात जो मेरे साथ परछाई की तरह जुडी है, हम अक्सर देखते हैं कि हमारे मम्मी पापा से झगडे होते हैं जो खत्म इस लाइन पर होते हैं कि आप मुझे नहीं समझ सकते. यह लाइन मैंने कभी नहीं कहीं क्योंकि जिन्होंने मेरी परवरि...