संदेश

जून, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मौत क्या है?

चित्र
मौत क्या है? जो भी है, जीवन से परे ही कोई बला है, जहां एक हंसता खेलता इंसान चुपचाप पड़ा होता है, न उसका दिल धड़कता है, न उसकी नब्ज चलती है, वह तो एक मिट्टी के  पुतले की तरह बेजान पड़ा होता है, जिसका शरीर बनावटी तौर पर तो उसको निहार रही आंखों वाले इंसान की तरह ही होता है. बस वह खुद के अस्तित्व को अपनी काया के साथ इस धरा पर छोड़ जाता है. खुशवंत सिंह लिखते है, "बिस्तर पर अकेला पड़ा-पड़ा इंसान मर सकता है और किसी को पता भी नहीं चलेगा, जब तक की चारों तरफ दुर्गन्ध न फैलने लगे, आंखों के गड्ढों में कीड़े न पड़ जाएं और मुंह पर छिपकलियां अपने लिजलिजे चिकने शरीर से रेंगने न‌ लगे." एक मृत शरीर और जीवित इंसान में क्या फर्क है, एक आत्मा ही तो है, जो जब जीवित व्यक्ति में होती है, तो उसे उसके उन्मुख नाम से बुलाया जाता है, उसके भाव होते है, उसकी आवाज होती है, उसकी नजर होती है, उसका खुद का नजरिया होता है, जब वह इस आत्मा को छोड़ देता है, तो सिर्फ और सिर्फ लाश होती है. आदि शंकराचार्य, मूलशंकर (दयानंद सरस्वती) , सिद्धार्थ इन सब सिद्ध पुरुषों में एक समानता है, इनके जीवन में मौत ही संन्यास क...