मोदी जी का इलेक्शन 2019 और अति राष्ट्रवाद
मोदीजी निजी तौर पर एक प्रधानमंत्री के रूप में मुझे ज्यादा प्रसंद नहीं है, उनकी कार्यशैली से मुझे तानाशाही और अभिमान की गंध आती है, वह जब जब विपक्ष के साथियों के बारे में बोलते है, ऐसा लगता है,कि कोई छुटभैया नेता बोल रहा हो, दश्वे विश्व हिंदी सम्मेलन को सहित उन्हें चार बार लाइव सुनने का मौका मिला है, हमेशा उनका भाषण रसविहीन सा लगता है, इसीलिए उनके भाषणों में या तो मैंने नींद की झपकियां ली है या वहां से पतली गली नापी है, हमेशा ऐसा लगता है, जैसे वह खुद को रिपीट करने की कोशिश कर रहे है, यूट्यूब पर 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद दिल्ली की एक सभा की वीडियो मैंने देखी, उसमें प्रधानमंत्री मोरारजी भाई से ज्यादा तालियां वाजपेई जी के आने पर बजी थी, तबकी तालियां आज की तालियों के उलट अच्छे वक्ता होने की निशानी थी, तब करतल ध्वनि का मतलब अच्छे व्यंग से होता था, अब तो विरोधी को गालियां देने पर भीड़ ज्यादा हो हल्ला करने लगती है, राजनीतिक व्यंग अब भाषणों से गायब सा हो गया है, जिस तरह राजनीति से नैतिकता का लोप हो रहा है, वैसे ही राजनीतिक शुचिता और अच्छी शब्दावली पतन की और है। द्वापर य...