समाप्त अध्याय
कहते है इंसान एक बार ही जन्म लेता है और एक बार ही मरता है, पर जिंदगी में कई लम्हे ऐसे आते है जो मौत के समान्तर नहीं तो मौत से कम भी नहीं होते है. बस वो दृश्य हमारे जीते जी हमारे सामने घटते है, कलेजा मुंह तक आ जाता है, रोम रोम आंतरिक पीड़ा को अनुभव करता है, जोर से चिल्लाने का या रो रो कर बिलखने का जी करता है, पर उस परिस्थिती में आंसू भी सूख जाते है, उन आंसू ओं को भी यह ज्ञान होता है, कि रोए तो किसके लिए? जो इन आंखों से निकलने वाले जल को देखकर बिलख उठता या अपनी साड़ी के पल्लू से आंसूओं को पोछता वो अब इस दुनिया में ही नहीं. इन अश्रु धारा को नयन चक्षु से बाहर निकलने के लिए किसी घटना विशेष का इंतजार करना पड़ता है, कोई किस्सा, स्मृति या व्यक्ति उस आंसू की जड़ हो सकती है. वह मौत जिस जीवित मृत्यु की संज्ञा मैने दी है, वह किसी अपने की लाश सामने देखकर आती है. यू तो हर परिपक्व इंसान को मालूम है, कि मौत अटल सत्य है, हर घड़ी, पहर और समय यह आपको घेर सकती है, पर इस सच को जानने और मानने के अंतर की खाई समझना कठिन है. मैं अप...